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दिसंबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

kavi vaibhav bekhabar

                                         एक तस्वीर बचपन की कभी इस कांधे पर तो कभी उस कांधे पर सावन आए तो आँगन के झूलों   पर तितलियों को पकड़ना कभी गुड्डे-गुड़ियों से लड़ना अक्सर लुका-छिपी के खेल में आड़े-तिरछे चलना सिर्फ हँसना और मुस्कराना उस दौर में ग़म नाम की कोई चीज ही नहीं थी बस डर था तो उस झोली वाले बाबा का टिमटिमटाते   तारों के उस पार एक शहर हुआ करता था जिसकी कहानियाँ हम कभी दादी कभी नानी से सुनते थे सबकुछ आज उस तस्वीर में फिर देखा मैंने जिसमें सुदबुदाते हुए , आँखों के काजल को फैलाया है मैंने । —कवि वैभव बेख़बर कानपुर  
                                         एक तस्वीर बचपन की कभी इस कांधे पर तो कभी उस कांधे पर सावन आए तो आँगन के झूलों   पर तितलियों को पकड़ना कभी गुड्डे-गुड़ियों से लड़ना अक्सर लुका-छिपी के खेल में आड़े-तिरछे चलना सिर्फ हँसना और मुस्कराना उस दौर में ग़म नाम की कोई चीज ही नहीं थी बस डर था तो उस झोली वाले बाबा का टिमटिमटाते   तारों के उस पार एक शहर हुआ करता था जिसकी कहानियाँ हम कभी दादी कभी नानी से सुनते थे सबकुछ आज उस तस्वीर में फिर देखा मैंने जिसमें सुदबुदाते हुए , आँखों के काजल को फैलाया है मैंने । —कवि वैभव बेख़बर कानपुर