शेर सँग्रह, वैभव बेख़बर
अब ख़ुद से करनी पड़ती हैं जो बातें तुमसे करनी थी! वैभव बेख़बर ग़रीबी सो रही फ़ुटपाथ पर, माँ-बाप आश्रम में हमारे शहर के लोंगों नें, कुत्ते पाल रख्खें हैं! वैभव बेख़बर जिन्हें इस आदमी को आदमी से जोड़ना था वही इंसानियत, तक़सीम करते जा रहे हैं! वैभव बेख़बर ईमान ही बेच दिया हो जिसने मत पूछो,कितना गिर सकता है वैभव बेख़बर मैं इतना भी कमज़ोर नहीं था मुझ में कुछ कमज़ोरियाँ थीं वैभव बेख़बर झूठे हवालों से,पेट नहीं भरता साहिब हम लोग रोटी का निवाला चाहते हैं वैभव बेख़बर हवा दूषित,पानी ज़रा नमकीन है तेरा शहर फ़िर भी बड़ा हसीन है वैभव बेख़बर अब आप ही पर्दा लगा लो हम आइनों से क्या छिपेगा। वैभव बेख़बर कौन ज़ानिब,चल रहे हो ? क़द...