शेर सँग्रह, वैभव बेख़बर

 अब ख़ुद से करनी पड़ती हैं

जो बातें  तुमसे  करनी थी!

            वैभव बेख़बर


ग़रीबी सो रही फ़ुटपाथ पर, माँ-बाप आश्रम में

हमारे  शहर  के  लोंगों नें,  कुत्ते  पाल  रख्खें हैं!

                 वैभव बेख़बर


जिन्हें इस आदमी को आदमी से जोड़ना था

वही  इंसानियत, तक़सीम  करते जा रहे हैं!

              वैभव बेख़बर


ईमान ही  बेच दिया हो जिसने

मत पूछो,कितना गिर सकता है

       वैभव बेख़बर


मैं इतना भी कमज़ोर नहीं था

मुझ में  कुछ  कमज़ोरियाँ थीं

  वैभव बेख़बर


झूठे हवालों से,पेट नहीं भरता साहिब

हम लोग  रोटी का  निवाला  चाहते हैं

  वैभव बेख़बर


हवा दूषित,पानी ज़रा नमकीन है

तेरा शहर फ़िर भी  बड़ा हसीन है

            वैभव बेख़बर


अब आप ही  पर्दा  लगा लो

हम आइनों से  क्या छिपेगा।

        वैभव बेख़बर


कौन ज़ानिब,चल  रहे हो ?

क़द  तुम्हारा  घट  रहा है।

       वैभव बेख़बर


रोटी का भी धर्म बना दो साहब

मंहगाई  की  भी  जात बता  दो,!

      वैभव बेखबर


ख़्वाब कोई  सजा सकते थे और भी

दिल नें  चाहा नहीं,कुछ तुम्हारे सिवा!

     वैभव बेख़बर


जाम, छलके  कहाँ  ख़ुदा जाने

लब  मेरे    पानी को  तरसते हैं!

             वैभव बेख़बर


आख़िर क्यों मरने पर आमादा हो बेख़बर

लोग  क्या कुछ नहीं करते  जीने के लिए।

         वैभव बेख़बर


आदमीयत का नामो-निशाँ  मिट चुका

और कुछ आदमी को  कहा जाए अब

   वैभव बेख़बर


ये दुनियाँ  पढ़ना भूल चुकी है

मज़हब,पुस्तक है मानवता की!

       वैभव बेख़बर



इक झलक जबसे देखा तुम्हें बेख़बर

फिर कभी कुछ तसल्ली से देखा नहीं

          वैभव बेख़बर



ख़्वाहिशें, मन्द हो रही हैं ख़ुद

हम हुए  रु-ब-रु  हक़ीक़त से!

        वैभव बेख़बर







वैसे तो आसमाँ में कोई कमी नहीं है

बस उठने-बैठने लायक ज़मीं नहीं है

      वैभव बेख़बर


या कानों  में  मेरे  ख़राबी है  कोई

या सदियों से तुमने पुकारा नहीं है

   वैभव बेख़बर





अब ढूंढ रहे हैं अदब की बज़्म

कूचा-ए-इश्क़ से निकले थे हम

        वैभव बेख़बर


खोट  नियत में  ना  आये तो

हर कर्ज़ उतारा जा सकता है!

        वैभव बेख़बर


कपड़े पहन के जाओगे, लुट ही जाओगे

शर्मो - लिहाज़  से ,   ये  बाज़ार  नँगा है!

              वैभव बेख़बर


जब बेवफ़ा हुआ तो जान पाए हम

वो शख़्स ,कितना झूठ  बोलता था!

     वैभव बेख़बर


देख लिया है  शहर तुम्हारा

बिन आँगन  के  घर होते हैं

        वैभव बेख़बर


जो जंग छिड़ी है, शाहों की होगी

ग़रीब तो , हालातों  से  लड़ते  हैं।

       वैभव बेख़बर








कहानी  चल  रही  है

किरदार  मर  चुका  है। 




शायर के घर का रौशनदान था

इश्क़ जब तलक लहूलुहान था

            



यहाँ कमज़ोर, दबोच लिए जाते हैं

बेख़बर ये बस्ती भी,एक जंगल हैं।

     वैभव बेख़बर






गर्दन पर  छुरी  रख कर  कहा  उसने

वक़्त अभी भी है,तुम ख़ुदकुशी कर लो

      वैभव बेख़बर


ज़िन्दगी ले गयी  क़रीब उसके

मैं उसी  से  निज़ात  चाहता था!

        वैभव बेख़बर


गाड़ी नहीं, तो पैदल ही सही

ज़िन्दगी  सब की गुज़रती  है

        वैभव बेख़बर



हार जाता हूँ ,मैं  ये  अलग बात है 

जंग के हर तज़ुर्बे से वाक़िब तो हूँ





दो दुकन-दारों के बीच ये लड़ाई है

एक  कॉंग्रेसी, ....एक  भाजपाई है



काम काज से होंगे, कुछ इत्तेफ़ाक़ से

ज़िस्म ख़ाक होने आए हैं सब ख़ाक से

            वैभव बेख़बर


तुमको छूने की दिल में हसरत है

कोई दाग़ न  लग  जाए  डरते हैं

     वैभव बेख़बर



हो चुका है थोड़ा ये पाक सा

दिल जला है  ख़ूब चराग़ सा

      वैभव बेख़बर


शुरू हुई थी  इक दहन ,याद है मुझे

वो तेरे ज़िस्म की छुअन याद है मुझे

      वैभव बेख़बर







अल्लाह ईश्वर जीजस जैसे नाम कई हो सकते हैं

लेकिन अब छल-कपट ही आदमी का मज़हब है



कुछ न फ़र्क पड़े दिन तारीख़ से जिन्हें 

ये नया  साल  उन्हें  भी मुबारक  हो!

           वैभव बेख़बर



कपड़े पहन के जाओगे, लुट ही जाओगे

शर्मो - लिहाज़  से ,   ये  बाज़ार  नँगा है!

              वैभव बेख़बर


दिल  ने  महसूस किए हैं  ज़ज़्बात के रंग

ख़ूबसूरत   हैं    तिरे    ख़यालात   के  रंग


हम   रहे    ढूढ़ते    चाँद-तारों  में   जिन्हें

रातरानी   में   छिपे  थे, वो   रात  के  रंग,


अपने   होने  का,  गुमान  भी  ठीक  नहीं

वक़्त,   बेवक़्त   बदलते   हालात  के रंग,








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