kavi vaibhav bekhabar
एक तस्वीर बचपन की
कभी
इस कांधे पर
तो
कभी उस कांधे पर
सावन
आए तो
आँगन
के झूलों पर
तितलियों
को पकड़ना
कभी
गुड्डे-गुड़ियों से लड़ना
अक्सर
लुका-छिपी के खेल में
आड़े-तिरछे
चलना
सिर्फ
हँसना और मुस्कराना
उस
दौर में ग़म नाम की कोई चीज ही नहीं थी
बस
डर था तो उस झोली वाले बाबा का
टिमटिमटाते तारों के उस पार
एक
शहर हुआ करता था
जिसकी
कहानियाँ हम कभी दादी कभी नानी से सुनते थे
सबकुछ
आज उस तस्वीर में फिर देखा मैंने
जिसमें
सुदबुदाते हुए,
आँखों
के काजल को फैलाया है मैंने ।
—कवि
वैभव बेख़बर कानपुर
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