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एक पैगाम तुम्हारे नाम
ग़ज़ल संग्रह
उन तमाम अच्छे बुरे
वक़्त से मिले हालातों को
समर्पित
जिन्होंने मुझे इस योग्य
बनाया ,
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पर कहाँ
हर किसी का क़ामयाब होता है
होने को तो हर नज़र में एक ख़्वाब होता है
खुशियां ,बुलन्दी की यूँ हीं नहीं मिल जाती
यहाँ
राहों में पीना बहुत
अज़ाब होतां है
भूलना नहीं आसान,महबूब बेवफ़ा हो तो भी
ये इश्क़ है ,जब होता है बेहिसाब
होता है
तुम ज़रा ज़रा सी बात पर रोया मत करो
बेवजह बारिशों का मौसम , ख़राब होता है
सच्ची मेहनत भी , एक इबादत है रब की
झूठ
तो एक न एक दिन बेनकाब होता है ,
उसे ज़ुनून ए उम्र कहा गया
जो इश्क़ पाकीज़ा था मेरा ,
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ईमानदारी से
लूटने की चाल करने लगे
धंधा सरकारी दफ़्तरों में दलाल करने लगे
ज़बाब पलट कर देते हैं ,बात बात पर अब
छोटे, बड़ों के सामने ये मज़ाल करने लगे
इंसानियत चाह थी ,इन्सां बनाने वाले की
हमीं लोग धर्म जाति पर बवाल करने लगे
सहूलियत से ज़बाब देना सिखाया जिन्हें
आज वही लोग हमसे सवाल
करने लगे
गैर तो गैर
यहाँ अपने भी बुरा मान बैठे
हम जिस दिन से अपना ख्याल करने लगे,
कम हो रहीं हैं ख्वाहिशें मुसलसल
उम्मीद आपसे इस कदर बढ़ रही है ,
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तन्हाई के आगोश में सोये बहुत हैं
हम याद करके उन्हें रोये बहुत हैं
इस मतलबी
दौर में नफरतें उगीं
मुहब्बत की फसलें हम बोये बहुत हैं
हक़ीकत तुम दर-किनार मत करना
यहाँ ख्यालों में लोग सोये बहुत हैं
एकलौता हुनर ही पूरा कर सकता है
ख़्वाब तो हर आँख नें सजोये बहुत हैं
मंज़िल तक
कोई यूँ ही नहीं पहुंचा
उसने रास्तों के दर्द
ढोए बहुत हैं
ख़ुद को समझने में अब भी वक़्त लगता है हमें
और वो मुझे पढ़ना चाहते हैं अख़बार की तरह
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दिल इतना भी ना दौलत में लगाया करो
कम ही सही पर,मेहनत से कमाया करो
कहीं जुर्म बन न जाए,वो इबादत तुम्हारी
अहसान करके कभी मत जताया करो
वतन-ए-तहज़ीब,शऊर सिखाना हो गर
मेरी ग़ज़लें अपने बच्चों को पढ़ाया करो
मैदान-ए-ज़ंग,सियासत है अपनी जगह
दुश्मन घर आये तो गले से लगाया करो
इन कमज़र्फ जुगनुओं से क्यों लड़ रहे हो
तुम्हे जलाना हो चिराग तो जलाया करो
ये बाज़ार है,सौदागर हो तुम सौदा करो
बस कीमत जज़्बातों की न लगाया करो
हर इल्म किताबों से नहीं मिलता बेखबर
कुछ वक़्त बुजुर्गों के साथ बिताया करो
ज़रा सी एक बात छेड़ना मेरी
फिर उनके चेहरे का रंग देखना
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इंसानियत को दिल में बसाये रखना
ख़ुद को बस इतना
समझाए रखना
अभी से
मंज़िल की फ़िक्र ना करो
नित्य बस
एक कदम बढ़ाये रखना
चाहे हो भी जाए ,ज़ख्म ज़िगर पर
एक मुस्कान चेहरे पर बनाए रखना
औकात ही क्या है
इन अंधेरों की
बस एक समां-ए-वफ़ा जलाये रखना
उम्र हर तअल्लुक की लम्बी होगी
थोड़ा फ़ासला दरमियाँ बनाये रखना
गैरों तक कहीं पहुच न जाएँ बेख़बर
राज कुछ अपनों से भी छुपाये रखना
मैदान-ए जंग हवाओं से लड़नी पढेगी
अगर तुम चिराग लेकर आये हो सफ़र में
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वापसी का सफ़र इश्क़ ने बनाया नहीं है
दिल चाहकर भी
उसे भूल पाया नहीं है
रेगिस्तान सी हो गयी ,ये वीरान ज़िन्दगी
मैं वो धुप हूँ ,जिसका कोई साया नहीं है
वो ख्वाबों की मंज़िल, तब कैसे मिलेगी
राह-ए-करम पे, क़दम तूने बढ़ाया नहीं है
वो क्या जाने,क्या होता है खौफ़-ए-लहर
जिसने घर रेत पे कभी बनाया नहीं है
दिन के अंधियारों में भटक रहे वो लोग
चिरागे हुनर जिस आंख ने जलाया नहीं है
आशिकी की उम्र में शायर हो जाना बता रहा है
दिल तुम्हारा किसी ने बड़ी बेदर्दी से तोड़ा है
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बाहरी चका-चौंध का उजाला
बहुत है
शायद आदमी अन्दर से काला बहुत है
उन्हीं को मिलते हैं यहाँ छाँव के दयार
धुप में बदन
जिसने उबाला बहुत है
गुलशन गुलाबों का मिल ही जाएगा
जिसने काँटों में ख़ुद को पाला बहुत है
देखने वालों ने,ताज-ए-सर देखा है बस
अब तलक पाँव में हमारे छाला बहुत है
इस मुकाम पे आज हम यूँही नहीं खड़े हैं
हमने गिर गिर ख़ुद को संभाला बहुत है
इतनी शिदत से आँखे राह देखती हैं
मर भी गये तो
तेरा इंतजार करेंगे
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अगर सच्चाई के वज़ूद में ज़रा सी खुद्दारी है
तो एक बूंद भी यहाँ सब समन्दर पर भारी है
इन हवाओं से कह दो,यूँ न भड़काओ बेवजह
शहर जला देगी,अभी राख़ में वो चिंगारी है
दोनों मिलकर लहराएँ,परचम हिन्दुस्तान का
गर मैं अब्दुल कलाम हूँ,तो तू अटल बिहारी है
पी ज़हर जी गयी थी,प्रेम पुजारन मीरा कभी
ज़िन्दगी की जंग तो हर शहंशाह ने हारी है
इंसानियत से बड़ा, कोई मज़हब
नहीं होता
यहाँ जातिवाद भेदभाव भी,मुल्क से ग़द्दारी है
गुलों की ये बदनसीबी है बेख़बर
कि अब माली ही बाग़ लूट रहे हैं
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हुनर के संग जो हौसला लेकर चलते हैं
वही लोग यहाँ
मन्ज़िलों से मिलते हैं
अंधेरों के सौदागरों को ये बात खल रही
चिराग मेरे हवा के खिलाफ़ भी जलते हैं
कमज़र्फ ही
ढूढ़ते हैं बहाना बेबसी का
हुनरवाले तो गिर-गिर के भी संभलते हैं
शायद जीस्त को कोई उम्मीद नज़र आये
चलो थोड़ी दूर तक , और साथ चलते हैं
ज़्यादा खामोश रहना भी ठीक नहीं
बेख़बर
अब उदासियों में तमाम,जज्बात उबलते हैं
महरूम रहा दुनियां से ये दिल बेख़बर
जाने किस नशे में ये उम्र गुज़र गयी
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ये दौर-ए-ख़ुशी,कभी ग़म चलता रहेगा
वक़्त भी वक़्त पर मंज़र बदलता रहेगा
कहाँ जाना है ये तो नदियाँ तय करेंगी
हिम-पर्वत पिघलता है, पिघलता रहेगा
इस नई पौध को लड़खड़ाने ना दीजिये
गिरने वाला तो धीरे-धीरे संभलता रहेगा
जब भी इन खरगोंशो पर छायेगा गुरुर
आगे कछुआ ही रेश में निकलता रहेगा
हुनर जब बन जाए इरादों का मुसाफिर
मुकद्दर यार की तरह साथ चलता रहेगा
आंधियां तो नफरतों की आएँगी बेख़बर
पर सदा
चिरागे उल्फ़त जलता रहेगा;
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जी बहलाने का
कोई क़िरदार नहीं हैं हम
पढ़कर फेकें जाएँ वो अख़बार नहीं हैं हम
जलाते हैं दिल-ए-दीप,सच की दस्तरस में
इन अंधेरों के कोई गुनहगार नहीं हैं हम
जिस्मों जाँ ईमान सब बिकने लगा है मगर
तुम दौलत से पा लो,वो बाज़ार नहीं हैं हम
नाज़-ओ-नखरे ,जाकर कहीं और दिखाइये
हुस्नवालों के इस कदर तलबगार नहीं है हम
कि किसी शहंशाह की शान में कसीदे लिखें
बेख़बर कोई ऐसे वैसे कलमकार नहीं हैं हम
अश्कों में भी उसकी तस्वीर नज़र आती है बेख़बर
हमनें बसा रखा है निगाहों में किसी को इस कदर
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इस धरती और अम्बर के दरमियान चाहिए
अब इन नये परिंदों को आसमान
चाहिए
कोई हटाता ही नहीं कभी रास्तों के पत्थर
मगर सफ़र सभी को यहाँ आसान चाहिए
सत्म-ए-हुनर,ख़ुद ही चलीं आएँगी मंजिलें
पहले जिगर में होना कोई अरमान चाहिए
कि सच को जगह मिले,इस दौर नकाबी में
अब इस दयार में आना एक तूफान चाहिए
इस कदर साथ तुम्हारा ज़रुरी है बेखबर
जिस कदर
किसी तीर को कमान चाहिए
तुम पर लुटाये जा रहे हैं हैं जाने जां
वक़्त
कितना कीमती है आजकल
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वो तालीम ज़िन्दगी ने पायी है सैलाबों से
हम सीख न सके जो सबक
किताबों से
कोहिनूर कोयले से ही निकलता है मगर
ज़रा बच के रहना इस दौर के नकाबों से
आफ़ताब हमारा आज क्यों गुमसुम सा है
आसमां ज़रा पूछ,अपने शहर के मह्ताबों से
कभी पढ़ लिया करिए ,ख़ामोशी का मंजर
और सवाल आ जाते कभी कभी ज़बाबों से
नादाँ निगाहों ने कभी पूछा ही नहीं बेख़बर
तुम्हारा हाल जान जाते,तुम्हारे ही ख़्वाबों से
झूठ से लड़ने की हैसियत न सही
पर सच बोलना काम तुम्हारा है
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ज़माने के माफ़िक नज़र आना ज़रूरी है
किरदार इस दौर में
सजाना ज़रूरी है
साथ छोड़ सकतें हैं मतलब निकलने पर
इसलिए दोस्तों को भी आजमाना ज़रूरी है
दहेज़ के सौदे से ये ताल्लुक नहीं संभलते
धारणा बेटा है कि बेटी ,मिटाना ज़रूरी है
डिज़िटल ख़्वाब दिखाने वालों को बता दो
भूख के लिए
अभी आबोदाना ज़रूरी है
यहाँ दौलत से सबकुछ मयस्सर नहीं होता
मुहब्बत भी इस दौर में कमाना ज़रूरी है
यहाँ इन इतराते हुए जुगुनुओं को बता दो बेख़बर
ये जो बुझे हुए चिराग हैं कल तक नूर इन्हीं से
था
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कोई कशिश मुहब्बत में शुमार न हो
दिल जब तक इश्क़ में बेकरार न हो
बस एक दफ़ा जी भर के देख लूँ उन्हें
चाहे
ज़न्नत का कभी दीदार न हो
ये बाजियां
हमें अब जीतनी हैं ऐसे
कि मैदाने-जंग में उसकी भी हार न हो
कि वीरान होकर भी
ढूंढे तन्हाईयां
दिल किसी का इतना बेज़ार न
हो
साथ निभाने का वादा तो करो बेख़बर
न होगा ऐसा कि समन्दर पार न हो
अगर हवाओं के खौफ़ से डर गए होते
तो चिराग अपने यहाँ भी मर गए होते
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अब और
कहीं अता नहीं होगा
दिल तुमसे कभी जुदा नहीं होगा
हाँ,ये दौर ज़रा सा कठिन है मगर
एक सा ही मंजर सदा नहीं होगा
शऊर-ए-वफ़ा भले न आये हमें
पर ये दिल कभी बेवफ़ा नहीं होगा
थक गया होगा जलते जलते ही
चिराग हवाओं से बुझा नहीं होगा
ज़ुल्म बेगुनाहों पर हो रहा है यहाँ
शायद जिन्दा अब ख़ुदा नहीं होगा
रातभर तभी चैन से सोते हो बेख़बर
रंग-ए-इश्क़ तुम पर चढ़ा नहीं होगा
कोई जानता ही नहीं कि कहानी क्या है
लोग समझना चाहते हैं किरदार हमारा
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ज़हन में कुछ नये ताने बाने रहते हैं
पर सदा यादों में याद ज़माने रहते हैं
क्या वो पगली उसी कूचें में रहती होगी
जिस गाँव में कुछ यार
पुराने रहते हैं
शायद मैं इसलिए अल्हड़पन में जीता हूँ
दर्द-ए-दिल को कुछ शेर बनाने रहते हैं
तुमको देखकर ये महसूस हुआ है कि
क्यों इस शहर में लोग दीवाने रहते हैं
ये पैगाम-ए-जंग उसी शहर से आया है
जिस शहर में कुछ दोस्त पुराने रहते हैं
दौलत ,दहेज़,और हैसियत का सौदा है
अब कहाँ इश्क़ के ,लोग दीवाने रहते हैं
बेख़बर वो तो अच्छे को भी बुरा कहेंगे
लोग वहां कुछ
जाने पहचाने रहते हैं
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बेचैन,मुन्तज़िर दिल का रास्ता रहता है
भरम उसके लौट आने का सदा रहता है
उतनी ही बेदर्दी से तोड़ती है हक़ीकत
आँखों में ख़्वाब जितना सज़ा रहता है
रहती है हरपल एक अज़ब सी बेकरारी
वो कई रोज जब हमसे खफ़ा रहता है
मेहनत दो वक्त की रोटी भी नहीं देती
शायद वो मज़दूर इसीलिए रोज़ा रहता है
ये मन्ज़र देखता तो ज़रूर चला आता
अब किसी और जहाँ में ख़ुदा रहता है
एतबार की चोंट तुम क्या जानो बेख़बर
ये ज़ख्म-ए-दिल उम्रभर हरा रहता है
मुहब्बतों में ही होगा दीदार उसका
मंदिर-मस्जिद में ख़ुदा नहीं मिलता
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बाज़ार तक लाये पर,खरीददार ना मिले
कहीं हमारी कश्ती को पतवार ना मिले
जबसे कर लिया है इरादा डूब जाने का
सारे समन्दर में मुझे मझधार ना मिले
ज़रा सोचिये
कि कैसे टिकायी जाएँगी
इन छतों को अगर कोई दीवार ना मिले
किस्से के कुछ
पहलु बदलकर देखिये
कहानी के लायक गर किरदार ना मिले
आशिकी में जो पतझर हुआ है बेख़बर
उस दिल को फिर कभी बहार ना मिले
मेरे बादलों में कहाँ था सैलाब इतना
हमें याद कर कुछ तुम भी तो रोये होगे
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इधर गया ना ही उधर गया
एक मंज़र यूँ ही ठहर गया
रहा इल्ज़ाम ताउम्र पत्थर पे
शीशा तो टूटकर बिखर गया
याद जब
जब उसकी आई
ज़ख्म ए जिगर
उभर गया
सच का साथ न दिया हमने
परचम झूठ का लहर गया
सारा दश्त महक रहा है आज
इस राह से कौन
गुजर गया ,
दर्द से इतना मुख़ातिब रहा है दिल
कि अब दर्द न हो तो भी दर्द होता है
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जो कुछ भी नज़रों को नज़र आता है
जाने क्यों,रूप तुम्हारा उतर आता है
मुद्तें गुज़रतीं हैं अजनबी राहों पर
तब कहीं जाकर
एक सफ़र आता है
आते हैं हर रात तुम्हारे ख़्वाब ख्याल
हर दिन ज़ख्म-ए-दिल उभर आता है
रखता है बहेलिया,गर तीर-कमान तो
परिंदे को भी उड़ने का हुनर आता है
महल बनाते,सजाते हैं फुटपाथ के लोग
बेख़बर,कहाँ सबके हिस्से में घर आता है
सस्ता समझ यहाँ जो लोग मुझे छोड़ गये हैं
अपनी परख पे एक दिन वो तरस खायेंगे
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कर ली मुहब्बत और परेशान बहुत हैं
ये आशिक अभी तो नादान बहुत
हैं
ख़्वाब ही देखतीं रहीं उम्र भर शायद
आँखे
हक़ीकत से अनजान बहुत हैं
लहरों से कश्ती तेरी डगमगाने लगी
अभी इस समन्दर में तूफान बहुत हैं
उस घर में माँ थी,तो जन्नत सी थी
भले ही ये महल
आलीशान बहुत हैं
हवाएं मजहबी जबसे चलीं हैं बेख़बर
लोग इस शहर के परेशान बहुत हैं
बुरा मत कहिये लोंगो को साहब
अच्छे हो तुम ये तुम्हारा कसूर है
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कोई आया न गया इस दिल-ए-मकान में
जला उम्रभर,चिराग-ए-मुन्तजिर दलान में
वो बागों वाली रौनकें,कभी न आ पाएंगी
ये फूल तुमने लगा तो दिये हैं गुलदान में
गुरुर हम भी तो देंखे ,इतराते सैलाबों का
इसलिए ले आये अपनी कश्ती उफान में
चल रहा है दौर-ए-मतलब ,दौलत का यहाँ
मियां इंसानियत मर गयी है अब इन्सान में
हमें हासिल ये मुकाम ,यूँ ही नहीं हुआ है
इन पैरों ने एक उम्र गुजारी है थकान में
रुसवा होना कोई चाहता ही नहीं बेखबर
मगर हर शख्स आना चाहता है पहचान में
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सच या झूठ कहने वाली बात नहीं है
अफ़सोस,कि तेरे पास ज़ज्बात नहीं है
कोहिनूर सा हुनर अगर शीशे में हो तो
कि तोड़ दे,ये पत्थर की औकात नहीं है
इश्क़
महसूस करना उसे आया न कभी
औ मेरे दिल के पास कोई इस्बात नहीं है
दर्द-ए-दिल ने सिखाया हमें फ़न ए क़लम
हमने विरासत में पाई ये सौगात नहीं है
ये पाँव,पथ में ही पत्थर हो गए हैं बेख़बर
चुभ जाए,इतनी काँटों की बिसात नहीं हैं
उजाले अपना वज़ूद खो चुके होते
अगर इस जहाँ में अँधेरे न होते
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ये जिंदगानी मेरी किसी के तो काम आये
इससे पहले कि यहाँ मौत का पैगाम आये
रूह तक हुआ असर तेरी एक झलक
का
चेहरे तो निगाहों में अब तलक तमाम आये
इन अदालतों से हमको,ये उम्मीद ही न थी
जुर्म किसी का और किसी पे इल्ज़ाम आये
ज़िन्दगी का हिस्सा जानकर जीना उसको
राह-ए-उल्फ़त में अगर कोई
क़याम आये
ये दम ही क्यों न निकले,प्यास में बेख़बर
आये लवों पर तो तेरे लवों का जाम आये ,
दूरियों का इसमें कसूर क्या जो
सांझ को सवेरे से मुहब्बत हुई
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हमने हसीन ख़्वाबों का तिस्लिम तोड़ डाला है
आईना
हक़ीकत का आँखों से जोड़ डाला है
मंज़िल की जुस्तजू, न बचा
खौफ़ सफ़र का
रुख़-ए-ज़िन्दगी कुछ इस कदर
मोड़ डाला है
उन्हें खो दिया तो कहीं ख़ुद को न खो दूँ अब
उसे पाने की खातिर ,सारा जहाँ छोड़ डाला है
कैसे बर्दाश्त करूंगा मैं ,करीब आने का मंज़र
दूरियों ने दिल को बुरी तरह झिंझोड़ डाला है
शायरी न करते तो ,कुछ भी न करते बेखबर
इस दिल नें इतने सारे गमों को ओड़ डाला है
रूह तपने लगती है ये शाम ढलते ही
फिर उनकी याद का सूरज निकलता है
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अह हवा अब इतनी भी न परेशानी दे
कि परिन्दा ,अपने परों की कुर्बानी दे
ज़िन्दगी तो दे रही है ,हादसे मुसलसल
इस किरदार के माफ़िक एक कहानी दे
ले आये हैं हम अपनी कश्ती समन्दर में
देने वाले अब कोई तू मंजर तूफानी दे
मर न जाएँ,बरसाती वादों की जुस्तजू में
अभी तू इन मुरझाये फूलों को पानी दे
मेरे मौला, ये निर्दयी बेरहम हो गया है
अब इस इंसान को फ़ितरत इंसानी
दे
ये दीवाना
कबीर सा फ़क़ीर हो न जाए
इससे पहले इसे कोई
मीरा दीवानी दे
दो वक़्त की रोटी मेहनत कमा नहीं पाती
मेरी ईमानदारी अब ज़हर खाना चाहती
है
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मुद्तों
बाद हुई है ,हमसे ख़ता कोई
शायद दिल ढूंढ रहा था बेवफ़ा कोई
न हुआ होता,आदमखोर इतना आदमी
अगर इस जहान में होता,ख़ुदा कोई
बहुत देर तक,न सजना संवरना तुम
कहीं चटक न जाए यहाँ आईना कोई
मंज़िल अपनी वहां कभी न बनाइये
जहाँ पंहुच ही न पाए
रास्ता कोई
हमसे छोटे-मोटे गुनाह न होंगे बेख़बर
अब जी चाहता है उम्रकैद सजा कोई
आये थे बाज़ार में बदलाव की तरह
वो ख़ुद ही बदल गये भाव की तरह
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किस मंज़िल के ज़ानिब डगर में हूँ
मैं पिछली एक सदी से सफ़र में हूँ
उससे कहा न गया खो देने के डर से
और आज तक मैं भी इसी डर में हूँ
जीस्त हादसों में रहकर भी मिटी नहीं
शायद मैं भी उस रब की नज़र में हूँ
सिर्फ़ ख़याल उसका,रात दिन रहता है
ना जाने मैं किस नशे के असर में हूँ
कभी न कभी लौटकर आएगा बेख़बर
यही सोंचकर
मैं उसके शहर में हूँ
परिवार को जीना चाहती थी ज़िन्दगी
मगर ये पेट हमकों परदेश ले आया
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खोने वाला कुछ पाने वाला
जीवन है
हसने रोने वाला
किसी का कोई जोर नहीं है
वो होता है,जो है होने वाला
अज़ब ख़ुशी तेरे आने की है
गज़ब का डर भी खोने वाला
मांग रहा है स्कूल का बस्ता
यहाँ बचपन कचरा ढोने वाला
रात भर जागता
काहे को है
क्या दिन बनाएगा सोने वाला
शेर ना लिखेगा,तो क्या करेगा
रोज दिल में दर्द पिरोने वाला
बस यही सोंच कर मैं मैखाने चला जाता हूँ
लड़खडाया हूँ इश्क़ में,लोग उसे कुछ न कहें
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अपनी बस्ती
का अँधेरा मिटा दीजिए
जलना चाहता है चिराग, जला दीजिये
पत्थरों से टकराने का हुनर सिखाइए
फिर किसी हाँथ में आईना दीजिये
इंसानियत में सच्चाई के फूल खिलेंगे
बस ये दीवार
मज़हबी गिरा दीजिये
गर जिन्दगी को चोंट से बचाना है तो
किसी के ज़ख्मों पे मरहम लगा दीजिये
बेख़बर,धूप से बचा लेगी, कार तुम्हारी
पैदल चलने
वालों को रास्ता दीजिए,
कश्ती मिल जाए तो किनारा छोड़ देते हैं
चाँद को पा जाएँ तो सितारा छोड़ देते हैं
काम छोटा हो या बड़ा अपने दम पे करो
यहाँ लोग सहारा देकर बेसहारा छोड़ देते हैं
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शौहरत की कब हम फ़ज़ा मांगते हैं
चाहत के सिवा तुमसे क्या मांगते हैं
ख्वाहिश ही न रही,मंज़िल की हमें
बस राहों से थोड़ी वफ़ा मांगते हैं
दस्तरस में हमारी वो आज भी है
हम उससे उसकी ही रज़ा मांगते हैं
आँधियों में
एक दफ़ा जलाये थे
अब वो चिराग़ हमारे हवा मांगते हैं
दीद-ए-सनम बेचैन रहते हैं रातदिन
मरीज़-ए-इश्क़ कब दवा मांगते हैं
रोटी को,लोग बैठते ,मंदिर के बाहर
ये कौन लोग हैं जो ख़ुदा मांगते हैं
क्यों ढूंढ रहा होता है ,वो भी बेख़बर
जिससे हम तेरे घर का पता मांगते हैं
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ये कैसा गज़ब हुआ इश्क़ में
पागल हो गया ख़ुदा इश्क़ में
मौत भी शायद रिहाई न दे
उम्र कैद की है सजा इश्क़ में
जल रहा है वो दिया भी खूब
ये कैसी चली
हवा इश्क़ में
है ये रोग जोग
का प्यारे
कहीं मिले नहीं दवा इश्क़ में
तुम्हें महसूस करना चाहता हूँ
अब हो भी जा बेवफ़ा इश्क़ में
हादसे इतने दिए ज़िन्दगी ने
दर्द देने लगा मज़ा इश्क़ में
सारी दुनियां भुला बैठे बेख़बर
हो क्या से क्या रहा इश्क़ में
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सोचने में कोई खास परेशानी नहीं है
पर
लफ्ज़-ए-अक़ीदत ज़ुबानी नहीं है
बह चुके हैं समन्दर,याद में किसी के
मेरी इन निगाहों में अब पानी नहीं है
अहले इस ज़वानी में,कुछ कर दिखा
जो गयी ये ऋतु, फिर आनी नहीं है
गुजरती है क्या क्या,किरदार से पूछों
बनती ऐसी
ही कोई कहानी नहीं है
करना ही नहीं है उस बेवफ़ा को याद
मगर वो मुहब्ब्त हमें भुलानी नहीं है
निबाह है, दर्द-ए-दिल,का ज़ज्बात से
मेरा फ़न-ए-सुखन ख़ानदानी नहीं है
इबादत की जिंदादिली कल बड़े करीब से हुई
माँ का हाँथ सर पे था मैं उसके पांव छू रहा
था
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सफ़र की सारी
आसानी खो गयी
हौसलों में थी,जो रवानी खो गयी
दौरे-दौलत,ने मतलबी बनाया ऐसा
फ़ितरत इंसानी की इंसानी खो गयी
ख़ामोशी कभी तुम समझ न सके
लफ्ज़-ए-इश्क़ की ज़ुबानी खो गयी
ताउम्र निवाले खोजती रही ग़रीबी
गर्दिश में बचपन,जवानी खो गयी
सच्चे किरदार को किस्सा न मिला
झूठे किरदारों में कहानी खो गयी
खुदरंग है, हर शेर का रंग बेख़बर
कहाँ तुम्हारी जिंदगानी खो गयी
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इल्म,अदब,शऊर,शालीका किसलिए
मरीज़-ए-इश्क़ को ये दवा किसलिए
कांटे तो ठीक थे इन फूलों के साथ
आइनों के घर ये आईना किसलिए
हो भी सकता है ,कोई तूफ़ान आये
आज आई है ये ठंठी हवा किसलिए
कोई मुंसिफ़ हमें बस इतना बता दे
मिलती है बेगुनाह को सज़ा किसलिए
जब अत्याचार को, बढ़ना है बेख़बर
तो फिर है
यहाँ ये ख़ुदा किसलिए
बेख़बर बुलंदियों को पाकर तुम कभी गुरुर मत करना
घरों को आहट तक नहीं होती मीनारें गिरतीं हैं
भूकंप में
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कारोबार ,कारोबार, कारोबार क्यों
हर जगह फैला है ये बाज़ार क्यों
एक दफ़ा धोखा खा चुका है फिर
उस शख्स पर इतना ऐतबार क्यों
नेकी की राह पर लेकर चल ख़ुदा
गुनाह करता आख़िर,गुनहगार क्यों
मंज़िल
पर पंहुचता झूठा क़दम
डगर,सच की
इतनी दुश्वार क्यों
बस में कुछ नहीं ,फिर भी बेख़बर
इस आदमी को इतना अहंकार क्यों
किसी और दरगाह में ना ये मन्नत मिलती है
बेख़बर माँ के पैर छुआ करो ज़न्नत मिलती है
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दिले-अरमां
सब तूफ़ान में हैं
हम इश्क़
के बियाबान में हैं
शज़र
मुहब्बत के लगायेंगे
हम जब तक इस ज़हान में हैं
हराने, हारने कोई
तो आये
हम एक सदी से मैदान में हैं
पल पल पर बदलते हैं ख़ुदा
कितने रंग तिरे इन्सान में हैं
नहीं की कद्र, सच की इसलिए
झूठ वाले आज पहचान में हैं
दिखाया हो जिसने आँधियों को रास्ता
उस दिये का फैसला ये हवाएं क्या करेंगी
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हम पे सितम ऐसे ढाए गए
जला जला कर
बुझाए गए
जब पत्थर ही चलाना है तो
क्यों ये शीशमहल बनाये गये
क्या हमीं सिर्फ़ मैले हैं,जो
ये आईना हमें दिखाए गये
रिश्ता कैसे निभाएगा ताउम्र
जिससे वादे न निभाए गये
गुनहगार वो भी कम नहीं थे
इल्ज़ाम
हमीं पे लगाये गये
तड़पाओ या महकाओ
अब ये मेहमान तुम्हारी है
मेरे सीने में जो धड़क रही है वो जान तुम्हारी है
40
तअल्लुक रख देते हैं अब निशाने में
नादां मसरूफ़ हैं इस कदर कमाने में
बात सूरज उगाने की किया करते थे
लोग वही लगें हैं चिराग़ बुझाने में
कम से कम झूठ तो न बोला न जाए
अगर फ़ायदा होता है सच छुपाने में
कि बच्चे स्कूल जाएँ,कुछ पढ़े लिखें
मुफ़लसी बाप को लायी कारखाने में
जहाँ ख़ुद से ख़ुद की बातें हों बेख़बर
आ कहीं दूर चलें, किसी वीराने में
किरदार-ए-मुहब्बत यूँ ही नहीं मिलते कहानी में
ख़ुद को बर्बाद भी करना पड़ता है जिंदगानी में
41
ख़ुद से करनी पड़ रही अब बगावत हमें
ऐसे मुक़ाम तक लायी है ये मुहब्बत हमें
उन्हें जिस दिन न देखूं,तो मेरी रात न हो
कुछ इस तरह हो गयी,उनकी आदत हमें
मुन्तज़िर हो जैसे वो ज़िन्दगी की मंज़िल
कुछ ऐसे महसूस होती उनकी जरूरत हमें
उन्हें न पा सके तो शायद खो दूँ ख़ुद को
उनसे कुछ इस कदर है अब उल्फ़त हमें
हम हो रहे हैं रफ़्ता रफ़्ता कुर्बान उन पर
भले ही दुनियां देती नहीं ये इजाज़त हमें
दिल ने चुना है तुम्हें चारागर
अब दवा दे या तू दे दे ज़हर
42
कुछ मुरझाये तो
कुछ गुल खिले ज़िन्दगी में
तरह तरह के लोग
सदा मिले जिन्दगी में
इन हवाओं
पर तो है दुश्मनों का कब्ज़ा
कैसे कोई
चिराग़ अब जले ज़िन्दगी में
यहाँ सर उठाकर हमनें हर सफ़र तय किया
राह भले ही छोटी हम
चले ज़िन्दगी में
रु-ब-रु ,बहारों से हम यूँ
ही नहीं हुए
तमाम,पतझर के मौसम पले ज़िन्दगी में
एक इश्क़ को इमान से निभाया हमने
सारे मंज़र ख़ुद-ब-ख़ुद बदले ज़िन्दगी में
अन्नदाताओं की हालत गर ऐसी ही बनी रही
तो एक दिन
ये आदमी आदमी को खायेगा
43
ये कैसे फासलें हैं बढ़ते ही जा रहे हैं
जैसे जैसे हम तेरे करीब आ रहे हैं
सिर्फ़ तेरी चाहत के खातिर ए सनम
दांव पर अपनी ज़िन्दगी लगा रहे हैं
गुल खिलाये मैंने,ज़िन्दगी में जिसकी
वो आज मेरी राह में कांटे बिछा रहे हैं
दुश्मन तो हमारे खौफ़ से ख़ामोश है
कुछ अपने हम पर सितम ढा रहे हैं
बता किसी महकदे का पता बेखबर
तिश्नगी में पाँव मेरे लडखड़ा रहे हैं
आप साथ दोगे तो आख़िरी साँस तक साथ देंगे
हम
दोनों भूल गये ये बात वक़्त बदलने के साथ
44
दीवानगी में दिल को तलबगार क्या करना
सिर्फ़ हसीं ज़िस्म के लिए प्यार क्या करना
आने वाला ख़ुद ही पीछे पीछे चला आएगा
बहुत देर तक किसी का इंतज़ार क्या करना
ज़िन्दगी ने ही सारे तोड़ दिए हैं भरोषे अब
इन मनचली अदाओं पर ऐतबार क्या करना
माँ की सूरत,जिसने आँखों में बसा रखी हो
उसे और किसी ज़न्नत का दीदार क्या करना
हैसियत के मुताबिक़,ख़रीददारी होती है जहाँ
बेख़बर उस बाज़ार में, क़ारोबार क्या करना
सिर्फ़ तबाही ही नहीं मचाई आकर इस तूफान ने
ये भी बता गया है कि किसमें कितना दम है
45
हर शख्स नकाबी ,क़ारोबार करे यहाँ
अब किसपे ये दिल ऐतबार करें यहाँ
झूठ छल कपट की है, पूरी कहानी
कैसे कोई सच का किरदार करें यहाँ
दुश्मन की दुश्मनी पर नाज़ है हमें
अब दोस्त ही पीठ पर वार करें यहाँ
सलीक़े से लुट रहे हैं ,सामाजिक लुटेरे
अब जुर्म भी क्या,गुनहगार करे यहाँ
काश कोई समझे,इंसानियत का धर्म
हर आदमी ,आदमी से प्यार करे यहाँ
कोई गुनाह करना या जी हुज़ूर हो जाना
बहुत आसन है आजकल मशहूर हो जाना
46
क्या मंज़र खुशनुमा दिया है
आख़िर उसने
हौसला दिया है
आँखें छीन ली थीं कल उसने
आज रौशनी का पता दिया है
दुशमनों का होता तो ठीक था
मगर दोस्तों ने दगा दिया है
शायद मंज़िल बहुत हसीं है
इसलिए रास्ता बुरा दिया है
आखिर
क्या इरादा है उसका
जाम खाली आधा भरा दिया है ,
इस दौर में उड़ना आसान हुआ तो
ये लोग मंजिलों का पता भूल गये
47
कुछ चंद गिरगिटों का फ़साना बुरा है
कौन कहता है कि सारा ज़माना बुरा है
सब शोहरत मुबारक हो तुम्हारे हुनर को
लेकिन बेईमानी से यहाँ कमाना बुरा है
उजाले तुमसे न हों तो कुछ बुरा नहीं
पर यहाँ जलते चिरागों को बुझाना बुरा है
अपनी अपनी भूख है सबका अपना पेट
पर किसी का छीनकर यहाँ खाना बुरा है
तुम भी मिट जाओगे,अगर सच मिट गया
सिर्फ़
इसीलिए झूठ को छिपाना बुरा है
पीने वाले गर
अपनी हदें न भूलें बेख़बर
तो चायखाना बुरा है न मैख़ाना बुरा है
बज़ीरी तक न पहुंच सके हुनर के प्यादे
और ज़मीर कुछ ज़मीर बेचकर शंहशाह हो गये
48
ज्यादा से ज्यादा चिराग बुझा देगा
झोखा हवा का और क्या सजा देगा
अंधेरों में हिम्मत,हौसला बनाये रखना
नूर-ए-हुनर, तुम्हे मंज़िल दिखा देगा
आदमी की फ़ितरत का यकीन क्या
मतलब निकले
उस दिन दगा देगा
दुनियां की दलीले चुपचाप सुनते रहो
रब ही सबका आख़िरी फैसला देगा
दर्द को अब दर्द से मिटा ले बेख़बर
तुझे यहाँ न कोई दवा दुआ देगा
प्लास्टिक में चढ़वा लिए हैं मार्कसीटों के साथ
और कैसे रखता
मैं तेरे खतों को संभालकर
49
उम्र इंतजार में कट गयी इस दीवाने की
पर उम्मीद आज भी उनके लौट आने की
उनको ख्वाहिशों में जबसे सजाया है हमने
सारी हसरतें ही खो गयीं इस ज़माने की
वक़्त-ए-ज़रूरत में साथ छोड़ गये वो
बात बात पे,बात करते थे मर जाने की
गर हो मेरे ग़मों में इज़ाफा तो होने दो
तुमको खुशियाँ मुबारक हो ज़माने की
कब, कैसे,क्यों ,हुई अब न पूछों बेख़बर
मुहब्बत कोई चीज़ नहीं समझाने की
एक मुदत तक हम सूरज से जंग लड़ते रहे
वो आसमां की सिपारिश कर चाँद ले गया
50
ज़िन्दगी कोई ख़्वाब नहीं निशात का
ये एक सफ़र है दिन का आधा रात का
ज़मीन बंज़र न होने देना ऐतबार की
इश्क़ एक फुल है दिल-ए-ज़ज्बात का
आसमां की नेमत संग भीग ले ज़रा
कहीं गुज़र न जाए मौसम बरसात का
मंजिलें आसां नहीं तो मुहाल भी नहीं
हाँ सफ़र कठिन है थोड़ा सुरुआत का
दौलत ने कल दे दी झूठ को साहूकारी
आज सच मुज़रिम बन गया हालात का
महगाई बढ़ने का एक कारण ये भी है बेख़बर
यहाँ लोग सस्ते सामानों को घटिया समझे हैं
51
ज़रा सी बारिशें क्या आयीं ख़्वाब में
ढह गया घरद्वार
मेरा सैलाब में
ये मैकदे
कैसे मिटाते ग़म मेरा
इश्क़ जैसा नशा ही कहाँ शराब में
सिर्फ़ खुश्बू ही देखी,वज़ूद में सबने
कुछ
कांटे भी थे उस गुलाब में
पतवार
बनकर चले आओ प्रिय
कश्ती डूब न जाए कहीं गिरदाब में
पूछे
मैंने कुछ सवाल तो उसने
मेरे ही
शेर सुना दिए जबाब में
सच इस दौर में कुछ इस कदर शर्मिंदा है बेख़बर
जब तक झूठ न बोलो लोग यकीन नहीं करते
52
मत पूछों अब हमसे क्या क्या करता रहता हूँ
न जाने
किस जुस्तजू में मैं फिरता रहता
हूँ
पथरीली राहों की ठोकर कहीं पत्थर न कर दे
कोशिश उठने की है अपनी,पर गिरता रहता हूँ
भा गयीं हैं ये बस्तियां जाना तो जंगल तक था
जो भी गलियां हैं इनमे प्यारी फिरता रहता हूँ
रातभर नयनन नीर बहाऊँ दिल को ऐसे तड़पाऊँ
अक्सर तेरी ही यादों में जीता मरता रहता हूँ
कहीं नफ़रती सियासत वतन तोड़ न दे बेख़बर
बनके चैनो-अमन की खुश्बू बिखरता रहता हूँ
हो कोशिश बस एक दूजे में घुल जाने की
फिर तो पानी भी बिकता है दूध के भाव
53
गूंगे बोल सकते हैं लोग बे-बयाँ समझते हैं
एक प्रेम वो भाषा है जो बेज़ुबां समझते है
चोट ऐतबार की जब दिल पर गुजरती है
न ज़ख्म समझते हैं न निशां समझते हैं
शोले, अंगारे मैंने पाल रख्खे हैं जिगर में
दुनियां वालों तुमको हम धुआं समझते हैं
जां देंगे इसकी खातिर तो जां ले भी सकते हैं
हम लोग इस मिट्टी को अपनी माँ समझते हैं
ख़बर कभी चर्चे में होगी क्या चीज़ है बेख़बर
अभी ये दुनियां वाले हमको कहाँ समझते हैं
ख़ुद को इतना लायक भी मत बनाना
तमाम उम्र कोहिनूर ने तन्हा गुज़ारी है
54
ये खोया है कैसे किससे पता करूँ
वो दिल ले गया अब मैं क्या करूं
इख़्तियार में होता तो रोक भी लेता
अपनी रूह को कैसे मैं मना करूं
दिल जल गया तो अब रौशनी हो
रास्ता यही कि हवा का सामना करूं
बाद पीने के नींद तो आ जाती है
तुझसे बिछड़ अब और मैं क्या करूं
ज़िन्दगी नाम कर दी तुम्हारे बेख़बर
इससे ज्यादा और क्या वफ़ा करूं
वो दरिया की तलाश में भटकते रहे उम्रभर
और एक प्यास हमें समुन्दर तक ले आई
55
आख़िरी ना ही किसी सुरुआत का है
ये किस्सा तो बस चंद लम्हात का है
कारोबारी हो तो गये सब इस बाज़ार में
पर यहाँ आज भी सौदा जज़्बात का है
सारे चारागर राजनीति करने लगे अब
इसलिए रोग मुल्क में जात-पात का है
जबाब में न दे
मुझे ये हुश्न हजारों
मेरा सवाल तो
बस मुलाकात का है
मुज़रिम औ सजा के वक़्त तय ये भी हो
कि बेख़बर
कितना कसूर हालात का है,
आधा कसूर तो उन निगाहों का भी होगा
कहाँ तीर ख़ुद कोई निशाना तय करता है
56
ये वक़्त चाहे,राह तुम्हे सरल या दुश्वार दे
ढल कर सच के सांचे में बदल ये संसार दे
इंसानियत के मर्म से बनायीं हैं कश्तियाँ
डूबेगीं ये कैसे देने वाले तू मझधार दे
पांच हज़ार साल पहले न कोई जाति धर्म था
आदमी था आदमी है इस आदमी को प्यार दे
नीदें हम तो तोड़ेंगे सब सोई हुई सरकारों की
सीने में चाह कोई खंज़र क्यों न उतार दे
कोई तोड़ नहीं सकता उतना पूरा कर बेख़बर
बस अपने समन्धों को जितना तू ऐतबार दे
काबिल होगा जब तो ख़ुद ही चला आएगा
अभी कच्चा है ये फल इसे पत्थर से न तोड़
57
जो पाया ही नहीं उसे खोना कैसा
हुनर जाने मिट्टी में है सोना कैसा
अपनी हार से कुछ सीख ले ज़रा
उसकी जीत पे बेवजह रोना कैसा
जब दरमियाँ-ए-दिल दूरियां कर लीं
अब पास होना भी तेरा होना कैसा
कंकर पत्थर से ये किला बनाया
मैं क्या जानू ये चाँदी सोना कैसा
खेल जिसका है खिलाड़ी भी है वो
यहाँ ये आदमी भी है खिलौना कैसा
रहबर ही होतीं हैं कुछ बंदिशे बुलन्दी के लिए
वैसे भी कटी हुई पतंगों को उड़ना नहीं आता
58
फूल न सही काँटों से मिला दे
पर किसी को झूठा न आसरा दे
राह आसान तो हम बना ही लेंगे
देने वाले तू मुश्किलों का पता दे
अभी तो बस पंख खोले है हमने
या’रब थोड़ा आसमां और फैला दे
क्या खौफ़ फिर हवाओं का हमें
तू एक चिराग़ चाहत का जला दे
मंज़िल करीब आ गयी है बेख़बर
हो सके मेरी कश्ती को भटका दे
ख़ुशी मिल भी जाए तो अच्छी न लगे
कोई इस कदर भी दर्द का आदी न हो
59
हैसियत को पहले आज़माते हैं लोग
अब कहाँ दिल दे दिल लगाते हैं लोग
झूठ का इसलिए
बोलबाला हो गया
सच को सलीके से बेच खाते हैं लोग
पता नहीं है ख़ुद को क्या करना है पर
एक दुसरे को बहुत समझाते हैं लोग
ज़िन्दगी को एक रंगमंच बना दिया है
जहाँ किरदार अपना सजाते हैं लोग
हवाओं से लड़ने की तो हिम्मत नहीं है
बस चिरागों पर ही ज़ुल्म ढाते हैं लोग
दिल में उतरने वाला कोई शख्स ढूंढियें
निगाहों में तो बहुत आते जाते हैं लोग
उस मुकाम पर ज़िन्दगी जी रहे है हम
बेख़बर जहाँ आकर मर जाते हैं लोग
60
हमें और तुम्हें एक हो जाना पड़ेगा
इस सियासियों से मुल्क बचाना पड़ेगा
जो आग लगाते हैं रौशनी के नाम पे
अब ऐसे
चिरागों को बुझाना पड़ेगा
इससे पहले हुनर में जंग लग जाए
ख़ुद लोहे को आग में तपाना पड़ेगा
तुम मंदिर-मस्जिद बाद में बना लेना
अभी फ़र्ज़-ए-वतन तो निभाना पड़ेगा
तू ज़मीर बेचकर कोई सौदा न कर
क़र्ज़ सूत
समेत सब चुकाना पड़ेगा
हो जायेगा जहाँ रौशन एक दूजे का हाँथ बटाने में
कुछ खर्चा नहीं होता चिराग से चिराग जलाने में
61
एक किरदार मिलेगा हर किरदार के आगे
गुलशन भी हो सकता है ख़ार के आगे
पतवार का हुनर,इम्तिहान तेरी कश्ती का
साहिल तो मिलेगा,पर मझधार के आगे
उसने कीमत में रख्खे अश्क और उम्मीद
मुझे बिकना पड़ा उस खरीददार के आगे
किसी बेकसूर पे सब इल्ज़ाम डाले जाते हैं
अब पैसा खड़ा रहता है गुनहगार के आगे
दस सर देकर कोई एक सर तक न लाया
आख़िर कैसी मज़बूरी थी सरकार के आगे ,
तोड़ा है किसी अज़ीज़ नें बड़े करीब से आकर
एक ख़्वाब जिसे मुद्तों से सजा रहा था दिल
62
शराफ़त छोड़कर बगावत को तैयार हो जायें
फूल को ऐसे भी न मसलो कि ख़ार हो जायें
लगा ही रहता है
हवाओं का तो आना जाना
अपने चिरागों से कहदो कि अंगार हों जायें
मेरे सच्चे वज़ूद से,गर ये टकरा जाएँ कभी
तो यहाँ बेनकाब सब झूठ के किरदार हो जायें
व्यापार में नफ़ा तो कभी नुकसान होता ही है
सौदा ऐसा न कर कि बर्बाद क़ारोबार हो जायें
बेख़बर मझाधारें क्या डुबोयेगीं कश्तियाँ फिर
ख़ुद हौसले जब किसी के पतवार हों जायें
जहाँ भी जाती है वहां तैयार कर लेती है
धूप का तो अपना कोई साया नहीं होता
63
आईना नहीं मिलता कभी पत्थर नहीं मिलता
मुज़रिम जब मिलता है तो खंज़र नहीं मिलता
बाज़ार में जाकर में ख़ुद को बेच भी दूँ लेकिन
कभी दिल के माफ़िक खरीददार नहीं मिलता
यहाँ चौबीस घंटे तो सबको मिलते हैं मगर
कभी रात दिन का लहजा बराबर नहीं मिलता
अब सफ़र को ही अपना मुकद्दर समझ लिया
दिल ठहर सकें जहाँ वो दिवारो-दर नहीं मिलता
मिलना है तो नदियों की तरह चले आओ बेख़बर
दरियाओं से जाकर कभी समंदर नहीं मिलता
कई और ज़लवे थे
आसमां में मगर
मैं यूँ ही रातभर सिर्फ़ चाँद देखता रहा
64
कुछ गोरों के नाम पर यहाँ काले ले गये
अब सारी शर्म-ओ-ह्या तो उजाले ले गये
सड़क छाप चोर को मुज़रिम बना दिया
सारा लुट का माल तो रखवाले ले गये
सियासत इतनी हुई विकास के नाम पर
सियासी गरीबों के छीनकर निवाले ले गये
बुलंदियां ठहरीं सिर्फ़ उन्हीं के वज़ूद में
जिन्हें मंज़िल तक पाँव के छाले ले गये
बेख़बर तो इश्क में लडखडाता रहा ताउम्र
मैखानो की रौनक तो पीने वाले ले गये
आज सत्ता तुम्हारी है राज तुम्हारा है मगर
भूल मत जाना कि एक किरायेदार हो तुम भी
65
दोस्ती यारी ही क्या हर ताल्लुक गवाओगे
गर किसी दिल को हद से ज़ियादा आज़माओगे
बिकने को तो बिक जाऊं मैं भी इस बाज़ार में
मगर कभी तुम कीमत हमारी लगा न पाओगे
जनता की सुन लो जनता के सेवकों,नहीं तो
अबकी बार कुर्सी क्या नज़रों से गिर जाओगे
अय्याशी के लिए इश्क़ का नाटक करने वालों
तुम कुत्तों की तरह मारकर जहन्नुम जाओगे
नियत बेचकर ये जो तुम कमा रहे हो बेख़बर
जब आएगा सैलाब तो कुछ बचा न पाओगे ,
गर देखना है आसमां तो उड़ना सीख बेख़बर
कभी पिंजरों में परिंदों के मौसम नहीं आते
66
होती रहती है जीत यहाँ तो हार कभी
पर मत बन जाना तुम गद्दार कभी
मंदिर-मस्जिद में न ढूंढ बस नेकी कर
ख़ुदा ख़ुद आ जायेगा तेरे द्वार कभी
इतने ज़ुल्म भी न ढा आज तेरी है तो
यहाँ हमारी भी आएगी सरकार कभी
तंग आकर हालात से खुदखुशी कर ले
कोई इतना भी न हो लाचार कभी
वो नज़र नज़र में क्या कह चला गया
हम समझ न पाए वो सार
कभी
हम भी सजदे इबादत करते थे सब
कभी ये इश्क़ जब ख़ुदा सा लगता था
67
नेकी करने का भी नेक सिला नहीं मिलता
इस दौर में नियत का पता नहीं मिलता
कभी फुरसत से दिल की बात करूं मगर
मैं ख़ुद
को भी कभी तन्हा नहीं मिलता
जो अपने वतन का एहतराम नहीं करते
उन्हें मस्जिदों में कभी ख़ुदा नहीं मिलता
इश्क़ वफ़ा क्या हमनशीं हमनवा क्या
हमें तो हुश्न भी कोई बेवफ़ा नहीं मिलता
वो फिर कोई नई राह ढूंढ लेगा बेख़बर
किसी हुनर को जब रास्ता नहीं मिलता
उजालों ने कब समझा भला फ़कीरी के अहसासों को
अँधेरा ही बचाता है शर्मिंदा होने से बे-लिबासों को
68
ये बात दिल को अपने कभी समझा नही पाए
तुम चले गये हो दूर तुमसे हम जा नहीं पाए
ख़रीद तो लीं मैंने सारी कायनात की खुशियाँ
मगर तुम्हारे बिन हम कभी मुस्करा नहीं पाए
राहें दिखायीं थी जिसने सफ़र के चिरागों को
क्यों वो लोग अपनी ही मंज़िल पा नहीं पाए
सिकंदर के बाद भी कई
सिकंदर हुए यहाँ
पर कबीर जैसी अजमतें कभी पा नहीं पाए
तुमने तो मुहब्बत में शेर कह लिए बेख़बर
हम दिले-बर्बाद का किस्सा भी सुना नहीं पाए
घर से निकलिए बस थोड़ी दूर चलिए
फिर रास्ता बताएगा कि जाना कहाँ है
69
अब अंधेरों को
बहुत खलने लगे हैं
शेर मेरे चिरागों से जलने लगे हैं
चलने वालों में
ये खौफ़ है छाया
जो गिरे हुए थे अब संभलने लगे हैं
उम्मीदें हैं कुछ यादें और है तन्हाई
हम ये किस दर्द में ढलने लगे हैं
ये दश्त भी नापाक हो गया क्या
जो फ़ूल सहराहों में खिलने लगे हैं
दौर है फ़रेबी ज़रा बचकर बेख़बर
लोग नक़ाब पहन निकलने लगे हैं
तेरे इश्क़ में बस बर्बाद है हुआ दिल
मौत आई न जीने का शऊर आया
70
औरों से जुदा ये मकान बना रहे
इन्सान से कहदो इन्सान बना रहे
शायद अब सच भी मतलबी हो गया
झूठ वाले इसलिए पहचान बना रहे
अपनी ज़मीन सुरक्षित रखनी पड़ेगी
अगर चाहते हो ये आसमान बना रहे
संघर्ष ही वक़्त का रुख बदल देगा
मंजिलों का बस अरमान बना रहे
ख़ुदा तो सिर्फ़ नियत नज्र करता है
इसाई तू हिन्दू चाहे मुसलमान बना रहे
गर तुझे सल्तनत ए इश्क़ की ज़ागीर चाहिए
तो आकर इस फ़कीर से महबूब बनके मिल
71
वक़्त के साथ हर मंज़र बदलता है
घर तो
कभी दिवारो-दर बदलता है
जाने क्यों एक याद उसकी ठहरी सी है
बदलने को तो हर शामों-सहर बदलता है
शिनाक्त करना उसकी मुश्किल है ज़रा
हर क़त्ल में ज़ालिम खंजर बदलता है
वैसे कई ज़िन्दगी मिटायीं होंगी लेकिन
कोई मीरा जब पीयेगी ज़हर बदलता है
मंज़िल तक वो कैसे पहुचेंगा बेख़बर
हर रोज जो अपनी डगर बदलता है
इश्क़ में उसका
कभी ख़ुद का
तमाम उम्र सिर्फ़ इंतजार किया
72
भले ही बात बात पर वादा नहीं करता
पर मैं अपनी बात से लौटा नहीं करता
खुश्बू का सौदागर यहाँ बनके आया हूँ
पर फूलों का मैं कभी सौदा नहीं करता
नदी अपने हुनर से ढूंड लेती है समुन्दर
पानी कभी राह किसीसे पूछा नहीं करता
लिए है हर कोई दूसरों को दिखा रहा है
आईना ख़ुद कभी कोई देखा नहीं करता
गर आदमी ने इतने ख़ुदा न बनाये होते
तो मज़हबी कोई भी झगड़ा नहीं करता
ग़रीबी से अच्चा कोई नहीं जनता है
यहाँ आदमी का रंग ज़िन्दगी का ढंग
73
निभाएंगे सदा इस संसार में हम
आये हैं जिस
किरदार में हम
मेरा धर्म इंसानियत है इसलिए
झुक लेते हैं हर दरवार में हम
मतलब से आया चला भी गया
थे मुद्तों जिसके इंतजार में हम
हमसे न होगी ये बेवफ़ाई कभी
भले रोज लूटें इस बाज़ार में हम
कई मझाधारों से टकराना पड़ा है
यूँ ही नही पहुचे इस पार में हम
मैं झूठ नहीं बोलता ये कहकर
हर शख्स यहाँ झूठ बोल रहा है
74
इंसानियत का इस कदर एहतिराम कर
सलाम चाहता है तो तू भी सलाम कर
धोखा खाकर एक इश्क़ की बस्ती में
शहर-ए-वफ़ा को
न यूँ बदनाम कर
सूरज न सही एक चिराग बनकर ही
इनसब अंधेरों की साज़िशे नाकाम कर
कश्ती और केवट के तू भरोषे न बैठ
अब तैरकर हासिल अपना मुकाम कर
ध्यान से सबकी बातें सुन ले बेख़बर
पर अपने मुताबिक ही हर काम कर
हमें तुम्हारी खुश्बू में मशरूफ करके बेख़बर
ये हवा मेरे घर से जाने क्या क्या उड़ा ले गयी
75
ज़मीं वाले हैं आसमानों से क्या
हमको ऊँची ऊँची उड़ानों से क्या
शौहरत-ए-फ़कीरी हमें भा गयी है
कोई मतलब अब खजानों से क्या
जो शाखों से पत्ते जुदा हो गये हैं
डर उन्हें आंधी औ तूफानों से क्या
भौतिकता के पीछे दौड़ते हो मगर
आदाब उगाओगे कारखानों से क्या
ज़ीस्त को एक मैकदा बना बेख़बर
होगा इन छोटे छोटे पैमानों से क्या
उसी तजुर्बे से
कई मुकाम पाए
आख़िर मेरे ग़म ही मेरे काम आये
76
यहाँ हर ख़ुशी ने तबाह किया मुझको
ग़मों ने कुछ लायक बना दिया मुझको
रातभर का सफ़र इत्मिनान से गुज़रा
दिन के उजालों ने बहका दिया मुझको
जिन बुझते हुओं को दिया था सहारा
आज उन चिरागों ने जला दिया मुझको
उम्रभर ख़ुद को बचाता रहा मैकदों से
उसकी एक निगाह नें बहका दिया मुझको
उस समुन्दर की हर अदा से वाकिब था
एक ज़रा से दरिया ने डुबा दिया मुझको
उनको तो तसल्ली हुई पर
आईना देखकर हैरान हुआ
77
तूफानो से बच गया तो आंधियां लूट लेतीं हैं
गरीबों की बस्तियां हसीं वादियाँ लूट लेतीं हैं
सरकारी दफ़्तरों की सेवाएँ सस्ती तो हैं पर
वहां मौज़ूद दलालों की महगाईयां लूट लेतीं हैं
आसां नहीं सच का सफ़र झूठों के शहर में
ज़रा संदेह हुआ तो परछाईयां लूट लेतीं हैं
कैसा दौर-ए-दिखावा चला है इस संसार में
ख्वाहिशों को अक्सर मजबूरियां लूट लेतीं हैं
फूलों में अब वो रंगत ही कहाँ रह गयी है
कली की मासूमियत फुलवारियां लुट लेतीं हैं
विसाल-ए-यार
तक पहुचते पहुचते बेख़बर
इश्क़ का सारा मज़ा तन्हाईयां लूट लेतीं हैं
हुनर,हौसला जिनके इरादों में जान है
यक़ीनन उन्हीं के क़दमों में आसमान है
78
ढोंगी रीत रिवाज़ मिटाना होगा
सच्चाई को सामने लाना होगा
कुछ हवाएं भी तेज होंगी वहां
जहाँ हमें चिराग़ जलाना होगा
किसी जंग में जीत की खातिर
ख़ुद को कई दफ़ा हराना होगा
सफ़र में आएँगी दुश्वारियां पर
कैसे भी मंज़िल तक जाना होगा
ये दौर है नक़ाबी इसलिए बेख़बर
आइनों को आईना दिखाना होगा
दरियाओं सा हुनर भी नहीं रखते
और लोग चाहते है समुन्दर होना
79
वक़्त आने पर तुझको बताएँगे हम
हर सबक सूत समेत चुकायेंगे हम
चला तो गया वो ताल्लुक तोड़कर
पर दावा है
ताउम्र निभाएंगे हम
ठोकरों नें सिखाया है चलना हमें
गिर भी गये तो संभल जायेंगे हम
रोक सकें तो रोक लें दुश्वारियां हमें
परवाने हैं समां तक
जायेंगे हम
क़लम की भाषा समझ ले बेख़बर
किसी दिन हथियार उठाएंगे
हम
सदा रूह को
पाक़ रखना बेख़बर
चार दिन का होता है जिस्म का सफ़र
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दोहरे किरदारों वाला किरदार नहीं होता
मुझसे कोई ऐसा
क़ारोबार नहीं होता
झूठ का चलन कुछ इस कदर हुआ है
सच मिल भी जाए तो ऐतबार नहीं होता
शायद ब्रद्धाआश्रम अब भी न होते यहाँ
अगर आदमी इतना समझदार नहीं होता
हालातों का भी कुछ कसूर होता होगा
यहाँ पैदायशी कोई गुनाहगार नहीं होता
कब्र भी ज़र्जर
हुई जा रही है बेख़बर
अब और हमसे तेरा इंतजार नहीं होता
न रहो मोहताज़
उजालों के बेख़बर
अपनी आँखों में कोई नूर पैदा कर
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यही मायने ज़िन्दगी समझ आया है
यहाँ इश्क़ ही एक सच्चा ख़ुदाया है
इश्क़ को ज़िद कहो, या ज़ुनून मेरा
ये क़दम सोंच समझ कर बढ़ाया है
ईमान का सौदा करके कमाना क्या
जब सब खोना है
जो भी पाया है
रौशनी के नाम पर आग लगाते थे
ऐसे चिरागों को भी हमनें बुझाया है
ये कैसे लोग आये हैं यहाँ बेख़बर
मीठी जुबां ज़हन शैतानी साया है
साथ दो क़दम चलकर थक गये
और वो चाहते है हमसफ़र बनना
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जिया सुलग रहा है पर धुआं होने नहीं देता
ये आलम-ए-तन्हाई हमें तन्हां होने नहीं देता
मुहब्बत में ख़ुद को मिटा डाला है मगर
हमें ये ताजमहल शाहजहाँ होने नहीं देता
तीर उस निगाह का बड़ा ही ज़ालिम था
ज़ख्म दे गया है
पर निशां नहीं होता
हर अहसास भूलकर वो शहर छोड़ तो गया
दूरियां ये दिल है कि दरमियाँ होने नहीं देता
हम भी नहीं चाहते कि अब कुछ और करें
कुछ करना चाहें भी तो जहाँ होने नहीं देता
मेरा दर्द तुझसे बड़ा है बेख़बर
कि तुझे दर्द है ,यही नेरा दर्द है
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चाहें सिक्का ही क्यों न उछाला जाए
पर अब कोई रास्ता तो निकाला जाए
इन गिरते लोंगों को बाद में देख लेना
जो लड़खड़ा रहे हैं उन्हें संभाला जाए
चार दुश्मन और क्यों न हो जाएँ मगर
अब आस्तीनों से साँपों को निकाला जाए
इससे पहले कि ये ख़ुदा को मार डालें
मजहबों को इंसानियत में ढाला जाए
गांधीगिरी से अब कोई बात न बनेगी
इन काँटों को काँटों से ही निकाला जाए
वो प्रधान सेवक ख़ुद को कहता है तो
इल्ज़ाम-ए-लूट और किसपे डाला जाए ,
बे-रहम,बे-अदब,बदनियत हो गया है
अब आदमी सिर्फ़ दिखता है आदमी सा
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सब हसीन है तो लाज़बाब क्या है
तुम हक़ीकत हो तो ख़्वाब क्या है
मुहब्बत में डूबे हैं हम क्या जाने
कि दरिया समुन्दर सैलाब क्या है
एक मुदत से है उसकी ही ख़ुमारी
हमें ज़हर पिला ये शराब क्या है
भरम में ही
रहने दो इश्क़ मेरा
न बताओ हमें उसका ज़बाब क्या है
हर्फ़ हर्फ़ लिखा है चेहरे पर बेख़बर
और ज़िन्दगी की
किताब क्या है
तुम क्या जान पाओगे औरत को बेख़बर
बदन तक ही देख पाती है निगाहें तुम्हारी
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जिसने बेंच दिए वो लोग ज़मींदार हो गये
अब जिस्मों-जां ईमान सब बाज़ार हो गये
वो करते रहे साजिशें मेरी कश्ती डुबाने की
और हम तैरकर एक समुन्दर पार हो गये
इतना अँधा हुआ कानून इस दौलते-दौर में
कातिल से ज्यादा मुंसिफ़ गुनहगार हो गये
इस जन्म में तो लौटकर जाना असंभव है
हम एक दफ़ा जिस दहलीज़ से पार हो गये
जिसे देखो कुचलकर चला जाता है बेख़बर
हम यूँ ही नहीं एक फूल से तलवार हो गये
शायद कोई इश्क़
उन आँखों में उतर गया है
वो देखते हैं आईना फिर आइने को चूमतें हैं
लेख़क परिचय

नाम
वैभव बेख़बर
पिता का नाम श्री नरेन्द्र कटियार
जन्म तिथि 10-02-1992
शिक्षा
एम.बी.ए
निवास
ग्राम खासबरा पोस्ट राजपुर
जिला कानपुर देहात (ऊ.प्र.)
209115
मोबाइल 9455062093
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