दरमियाँ ग़ज़ल संग्रह 72
1
2122 121 122 22
इन
हवाओं को आज
बता
दो यारों
आँधियों में चिराग़ जला दो यारों
बात
करते बहुत क़िस्मत की,उनको
कुछ
हुनर का,कमाल दिखा दो यारों
जो करें भेदभाव, अगर मानव में
मज़हबी वह दिवार, गिरा दो यारों
रौशनी की बहार, चले गुलशन में
प्यार
के फूल-पात खिला दो यारों,
[11:09 AM, 9/3/2019] वैभव बेख़बर:
2
तीर
नज़र ना ही खंज़र से
पत्थर टूटेगा पत्थर से
दरिया
पर रौब जमाते हैं
डरते हैं लोग समुंदर से
चहरे
पर मुस्कान लिए
हैं
पर
घायल हैं सब अंदर से
बंज़र होने से बच जाती
गर
होती बारिश अम्बर से
दूरी न घटे , बैठे बैठे
मन्ज़िल
होती पास सफर से
3
वैभव
बेख़बर:
ग़ज़ल
करता है मुझको पानी पानी
जब
जब आंखों से बहता पानी,
शायद
जाम ज़हर का ,ना पीता
गर
प्यासे को मिल जाता
पानी
गन्दे, ताल-नदी, और कुँए सब
अब बोतल में बिकता है पानी
इस बस्ती से बादल उठ्ठे थे
जाकर
दूर कहीं बरसा है पानी
आग लगाकर अपने जंगल में
ढूंढ रहा है मंगल में पानी।
वैभव
बेख़बर
[4]
:
वज़्न 22
22
22 22
वैभव
बेख़बर
राज कई फिर से ,खुल जाते
सच
के साथ अगर तुम आते
पाले हैं आंखों में जुगनू
फ़िरते सबको चाँद बताते
कम
हो जाता,भार सभी का
इक दूजे का हाथ बटाते
भूख
अगर, हमको न सताती
घर से इतनी दूर न आते
सबको,सबका हिस्सा,मिलता
गर,मेहनत कर, लोग कमाते
5
आवाज़ सच्ची सदा उठाते रहो
तुम
झूठ को आइना दिखाते रहो
पत्थर,बड़े से बड़ा,बिखर जाएगा
बस
चोंट,खाते रहो, खिलाते रहो
इक
दिन,निशाना,सही लगेगा कभी
तुम
कोशिशें ,सिर्फ दोहराते रहो
हो ,जाएगा दूर, हर अँधेरा यहाँ
बस
हौसलों में
हुनर,जलाते रहो
सारा,जहां फिर,चमक उठेगा यहाँ
मिलकर
दिये, से दीया जलाते रहो
6
22 22 22 122
वैभव
बेख़बर
कोई और न,दिलपर सितम कर
मेरे मालिक मुझपर रहम कर
तकलीफ़ रही हैं बढ़ हमारी
थोड़ी
सी,मुश्किल आज कम कर
अश्क़
बहाऊँ, कब तक ज़मीं पर
हो जाये, बरसात मौसम कर
महिमा, तेरी सब ने सुनी है
जलते
शोंले आज शबनम कर
झूठ कभी ,सच बन ना ,सकेगा
मेरा सर चाहे तू , क़लम कर।
7
वैभव
बेख़बर
कुछ चोंट सफर में खाये हम
उनसे मिलने जब आये हम
इश्क़ यहाँ आसान नहीं है
सब
खोये ,तब कुछ पाये हम
कांटों
पर, चलना ,मुश्किल था
कल ,वो राह, गुज़र आये हम
हाँथ हुनर से, खाली निकला
बद-क़िस्मत के हैं , जाये हम
बर्बाद
किया, इश्क़ में खुद को
तब ,दर्दे-दिल ,लिख पाये हम
8
अब
नदी, ना कुएं से, ये आब ला
जा ,किसी मयकदे से शराब ला
आब=पानी
आज मेरी ,अना का सवाल है
ढूंढ
कर, तू कहीं से ज़बाब ला
कुछ हुनर का वज़ूद पता चले
अब समन्दर में एक सैलाब ला
मन्ज़िल
,कहाँ गयी छूट हमसे
देखना
है, सफ़र का हिसाब ला
सब सजा
दूं, हक़ीक़त की तरह
मेरि आंखों में अपने ख़्वाब ला
डगमगाने
, लगें हैं पाँव अब
ज़िन्दगी और, दर्द अज़ाब ला।
9
नक़ाब
,हटा ,अपने गुमान से
धूप आने दे, रौशनदान से,
निशाने
पर ,जब वो आता है
तीर,निकलता नहीं कमान से
मां
केसाथ,वो बचपन के पल
ख़ूबसूरत
थे, दोनो जहान से
हवाओं
पर कोई ज़ोर नहीं है
औरवो
लड़ना चाहे तूफान से
मन्ज़िल
क्या, मिले क़ायनात
गर
कोशिश हो, दिलोजान से
उड़नेवालों
की तरह,गिरे नहीं
जो
हुनर ,चढ़ेगा पायदान से।
10
बह्र 122 122 122 122
वैभव
बेख़बर
सियासत, के सच्चे , हवालों, ने लूटा
अँधेरों
, से ज़्यादा, उजालों ने लूटा
सभी घूस खाते, हैं दफ़्तर ,के बाबू
अगर
बच, गया तो, दलालों ,ने लूटा
हरेक मसला,मज़हबी कर दिया,फिर
वतन
को, वतन के, बवालों , ने लूटा
निग़ाहों,को मन्ज़िल,नज़र आ,गयी जब
हमें पाँव के सुर्ख़ छालों ने लूटा।
11
सुबह,दोपहरी,यहां हर शाम ठहरे
लवों
पर आकर,तुम्हारा नाम ठहरे
कसूर,सफ़र में,तुम्हारा भी बहुत है
मुहब्बत
में,हम अगर बदनाम ठहरे
छलक
जाता है, मिरे छूने से पहले
अगर
आँखों में, सुनहरा जाम ठहरे
मुहब्बत
के,खेल में, आ तो गए हैं
फ़रेबी
अक्सर यहाँ नाक़ाम ठहरे
तुम्हारे
जैसा नहीं आया
नज़र
तक
मेरी
आँखों में, हसीन तमाम ठहरे।
12
वैभव
बेख़बर
इस
क़दर हम लाचार हो गए
फूल
सब के सब,ख़ार हो गए
क़ैद
होगा, अब बे-गुनाह ही
सब गुनहगार ,फ़रार हो गए
इक
दफ़ा,हमको बोलना पड़ा
झूठ और , तलबगार हो गए
डॉक्टर
थे, हम, गांव गांव के
शह्र आकर, बीमार हो गए
छोड़ ,गैरों ने, रास्ता दिया
लोग, अपने दीवार हो गए
हो
रहा है, अब प्यार आपको
जिस्म, जां ,जब बाज़ार हो गए।
13
जो,आपस में, उलझन रहती है
थोड़ी थोड़ी सबकी गलती है
होती जाती, रोज बुरी,दुनिया
जाने
किस ,रस्ते पर चलती है
वक़्त,वही दिन को भी मिलता है
रात यहाँ उतनी ही, पलती है
भरता
है, गागर में सागर ,जब
आग
तभी ,पानी में लगती है
मतलब,धन-दौलत की,दुनियां में
सब
गाज, वफ़ा पर ही, गिरती है
14
:
उजालों का, ख़याल ख़्वाब कौन दे
तिरी आंखों में, आफ़ताब कौन दे
सभी
नें, झूठ बे-हिसाब कर लिए
मग़र सच का यहाँ ,हिसाब कौन दे
सियासत, जब अमीर लोग ले गए
ग़रीबी, मर रही, ज़बाब कौन दे
समन्दर में, सब बादल ,बरस गए
हुई बन्जर ज़मीन, आब कौन दे
छिड़ी है, ज़ंग पेट के लिए यहां
बनाकर आपको क़बाब कौन दे
15
:
मुफ़ाईलुन, मुफ़ाईलुन,मुफ़ाईलुन
वैभव
बेख़बर
अँधेरी रात , रौशन है, हुआ क्या है
दिया
कोई नहीं था,फिर ,जला क्या है
बिता दी उम्र सारी, कैद में उनकी
मग़र
मालुम नहीं,हमको,ख़ता क्या है
ज़माना
हो,रहा अब,दिन-ब-दिन,बदतर
बताओ आप ही अच्छा, बुरा क्या है
बग़ैरत
है ,लगी जो, होड़,मज़हब की
नहीं जाने, यहाँ कोई , ख़ुदा, क्या है
मिटा दूं, दूरियां, मालुम ,करो पहले
हमारे बीच ,कितना ,फ़ासला क्या है।
16
वैभव
बेख़बर
दिया सहारा आँचल जैसा
ज़हन
हुआ जब घायल जैसा
लगी,ज़मीं जब तपने दिलकी
बरस
, गया वो , बादल जैसा
शहर, वहाँ जाने से , पहले
हरा भरा था, जंगल जैसा
बधा, है दिल क्या,उन पैरों में
धड़क रहा जो ,पायल जैसा
नज़र
ने ,देखा उनको जबसे
ज़िगर
हुआ है, पागल जैसा|
17
:
आपका
गुमां कुछ नहीं
ज़िन्दगी ये जां कुछ नहीं
सिर्फ सिर्फ़ नुकसान है
और
यह दुकां कुछ नहीं
दर्द तो बहुत है मगर
ज़ख़्म का निशां कुछ नहीं
प्यार आपसी गर नहीं
घर यहाँ, मकां कुछ नहीं
है महज़ इशारे नज़र
इश्क़ की , ज़ुबां कुछ नहीं
दूरियां
बहुत थीं कभी
आज दरमियां कुछ नहीं
18
[8:05 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर: वैभव बेख़बर
बेबस
औ,बद-नसीब हैं
जो लोग यहाँ गरीब हैं
बरसे, गीली,ज़मीन पर
बादल,कितने,अजीब हैं
गर्दिश, में दूर हो गये
सब
मतलब के हबीब हैं
हबीब=दोस्त
यार
छोड़
चले, साथ हौसले
जब
मन्ज़िल,के करीब हैं
झूठ
को,सच अबलिखें,यहाँ
सत्ता
के कुछ
अदीब हैं
अदीब=साहित्यकार
रक़ीब
[8:05 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर:
19
2 1 2 1222 1222
छोड़कर तन्हा ,दिल और जां लेकर
वो चला गया, जाने कहाँ लेकर
आज
फिर किसी का घर जला होगा
आज
फिर हवा आयी धुँआ लेकर
लोग इस शहर के , सब लुटेरें हैं
अब
चलो कहीं औऱ ये दुकाँ लेकर
दिल
, करीब लाना , चाहता है वो
फ़ासले बहुत से , दरमियां लेकर
वक़्त ही, मुक़द्दर का, सिकन्दर है
मत फिरा करो, झूठा गुमां लेकर।
वैभव
बेख़बर
20
[8:06 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर:
वज़्न 212 2122 122 12
वैभव
बेख़बर
रास्ते
, तो सही से , बताया करो
हौसले
, मत किसी के, गिराया करो
कर
सके,ना अदब,जो यहां प्यास का
जाम
उसको कभी मत पिलाया करो
सच
कभी तो नज़र आयगा आंख को
ख़्वाब, झूठे सदा मत दिखाया करो
हाँथ, लेकर चलो अब, हुनर साथ में
सर
यहां, दर बदर ,मत झुकाया करो
हैं यहाँ, इश्क़ के, कुछ सलीक़े-हरम
हर किसी से, नज़र मत लड़ाया करो
हरम-इबादतगाह
दर्द की शायरी अब बहुत हो चुकी
प्यार के , गीत भी गुन गुनाया करो।
[8:06 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर:
21
अरकान= फ़ऊलुन,फ़ऊलुन,फऊलुन,फ़ऊलुन
122 122 122 122
वैभव
बेख़बर
नहीं हैं अभी ठीक हालात मेरे
अग़र
चल,सको तो ,चलो साथ मेरे
कभी
लौटकर,जो नहीं आएगा अब
उसे याद करते ख़यालात मेरे
अचानक
हवा तेज़,चलने लगी थी
सभी
खा गये फिर दिए मात मेरे
बसाने चले थे ,नगर ज़िन्दगी का
गये इश्क़ में , टूट ज़ज़्बात मेरे
जहाँ
देखिए, ज़ख़्म बिखरे पड़े हैं
सिवा
दर्द के कुछ ,नहीं हाँथ मेरे
[8:07 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर:
22
ग़ज़ल। (वैभव बेख़बर)
1222 22 22 2 2 12
दिखाते
ना, तेवर अपना चलते हुए
अगर देखे होते,सूरज ढलते हुए
निकल
आये हैं काटें राहमें इसलिए
चले
जाते थे सब फूल मसलते हुए
किया
था,दावा पानी होने का वहाँ
निग़ाहों
ने मन्ज़र देखे जलते हुए
बहकते
कैसे,हम मन्ज़िल से बेख़बर
तुम्हारे
साथ क़दम खुश थे चलते हुए
[8:07 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर
23
:
ग़ज़ल
अर्कान-मुफ़ाईलुन×4
वज़्न
1222
1222 1222 1222
वैभव
बेख़बर
अँधेरों
में, चिराग़ों को, जलाने का हुनर देदे
सफ़र
पूरा,करूँ मैं भी,अगर तू हमसफ़र देदे
वफायें
याद करती जब,सतातीं हैं, रुलातीं हैं
ज़रा
कोई,मिरे दिल की,उन्हें जाकर ख़बर देदे
गया
है थक ,कहानी में ,हवाओं की ,रवानी में
ज़मीं
पर इस, परिन्दे को,कोई शाखे-शज़र देदे
बहुत
प्यासे ,नज़ारे हैं, मुहब्बत के , सहारे हैं
ये
साहिल सूख, ना जाये,समन्दर की, लहर देदे
गुज़ारा
हो, मिरे घर का ,अगर तेरा सहारा हो
ज़रा
सा हौसला मुझको,रहमकर बे-ख़बर देदे।
[8:07 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर:
24
ये न, देखेगी घर किसका है मिटा देगी
आग लगी तो सारा शहर जला देगी
आप डगर अपनी, खुद नई बनाईये
आख़िर क्यों तुमको, भीड़ रास्ता देगी
इश्क़ हमारा,जब यार बेवफ़ा निकला
और
भला क्या ,ये ज़िन्दगी सजा देगी
बस जारी,रखना ,तुम सफर यहाँ अपना
मन्ज़िल
तुमको,इक रोज खुद,बुला लेगी
[8:07 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर
25
:
22
22 22 22 22
वैभव
बेख़बर
बस तुम ही तुम हो इस वीराने में
आकर देखो दिल के तयखाने में
पहले
, हमको तड़पाया ज़ालिम ने
फ़िर
ख़ुद लाकर छोड़ा मयख़ाने में
किवो हरजाई हमको भूल गया है
सदियां गुज़री दिल को समझने में
और
हमें फिर उसने भी, छोड़ दिया
सब
कुछ खो डाला ,जिसको पाने में
नज़्म
ग़ज़ल,या लिख्खा हो शेर कोई
ज़िक्र उसी का है ,हर अफ़साने में।
[8:08 AM, 9/13/2019] वैभव बेख़बर:
26
22 22 22 22 22
वैभव
बेख़बर
बस तुम ही तुम हो इस वीराने में
आकर देखो दिल के तयखाने में
पहले
, हमको तड़पाया ज़ालिम ने
फ़िर
ख़ुद लाकर छोड़ा मयख़ाने में
किवो हरजाई हमको भूल गया है
सदियां गुज़री दिल को समझने में
और
हमें फिर उसने भी, छोड़ दिया
सब
कुछ खो डाला ,जिसको पाने में
नज़्म
ग़ज़ल,या लिख्खा हो शेर कोई
ज़िक्र उसी का है ,हर अफ़साने में।
27
ज़ुरूरी
नहीं,
हो
बुरा
आदमी
हो
सकता है थोड़ा ख़रा आदमी
करेगा
हुक़ूमत
बुरा
आदमी
अगर
,झूठ
से
अब
डरा
आदमी
यहाँ
तो ,
किसी
को,
खबर
ही
नहीं
ग़रीबी
, में कितना मरा
आदमी
कोई
ना,
करेगा
तुम्हारी
मदत
बहुत
दे,
रहा
मशविरा
आदमी
बता
भीड़,
दैरो-हरम
की
रही
यहाँ
पाप
से
है,
भरा
आदमी
विषय
मज़हबी,
ये
सिखाने
लगे
सियासत
,से
अब
है डरा आदमी,
…
28
फ़िर
इश्क़ की
मिसाल
हो
गया
जब
फूल
पाय
माल हो गया
इक
ज़िन्दगी
, तबाह
हो
गयी
दिल,
दर्द
में
हलाल
हो
गया
मुझको
ख़बर
नहीं,
कहाँ
लुटा
किस
मोड़
पर
निहाल
हो
गया
इक
तीर का , शिकार, हम हुऐ
उनको
लगा,
कमाल
हो
गया
आयी
हक़ीक़त
जब
सामने
ग़म
और
बे-मिसाल
हो
गया।
29
रात
घनघोर
है कुछ
जला
दे यहाँ
फूल
पतझर में कोई खिला दे यहां
ज़ख़्म
हो जाएगा
आज
फिर से हरा
तीर
कोई
नयन
से,
चला
दे यहाँ
दर्द
आ
ही गया,
जब
तिरे
मयकदे
शाम
मदहोश
है ,कुछ
पिला
दे यहाँ
ज़श्न
की महफ़िलें,फिर मिलें कब कहाँ
आज
की
रात,
दुनियां
भुला
दे यहाँ।
30
प्यार
में
रातदिन
जाने-जाँ
हो
गया
दर्द
क्यों इस
कदर
मेहरबाँ
हो
गया
सच ,सफ़र में, भटकता रहा उम्रभर
झूठ
ऐसे
उड़ा,
आसमाँ
हो
गया
रास्तों
में
रहे
, साथ
अपने
सभी
हादसा
क्या
बतायें,
कहाँ
हो
गया
जलजला
देखकर, लोग
बोले
बहुत
वक़्त
पर
आदमी , बे-ज़ुबाँ
हो
गया
रोज़
आँखे
नये
, ख़्वाब
पाले
रहीं
आग,दिल में लगी,सब धुँआ हो गया
साथ
रहने
में
, कोई
नहीं
फ़ायदा
फ़ासला
,जब
दिले-दरमियां
हो
गया
आप
चाहो
,तो
आधा
सुना
दूँ तुम्हें
दर्द
आधा
ग़ज़ल
में , बयाँ
हो
गया।
31
उम्रभर
इस
तरह काम
चलता रहा
पीर
दिल में रही प्रीत लिखता रहा,
आंधियाँ
तो बहुत तेज आयीं मगर
याद
में आपकी, दीप जलता रहा,
हौसला,
मुश्किलें,
तोड़
पायीं
नहीं
रोज
गिरते
हुये
, मैं
सँभलता
रहा,
कुछ
मिलेगा नहीं,इस तरह तू अगर
गिरगिटों
की तरह, चाल चलता रहा,
मन्ज़िले
चूम लीं, हर हुनर ने यहाँ
बे-हुनर
उम्रभर
, हाँथ
मलता
रहा,
लफ़्ज़
घायल
मिरे, शेर
लिखते रहे
इश्क़
दिल में लिये, दर्द पलता रहा।
32
:
देख कभी,
सर्द
शहर की
रातों में
लोग
मिलेंगे
सोते
फुटपातों
में
अब
लूट रहें हैं, खुद माली अस्मत
फूल
खिलें तो
कैसे
इन साखों में
क्या,इक दूजे का ,सिर फोड़ेंगे,जो
सब
पत्थर लेकर निकले हाथों में
रिशवत
देकर,जब मुज़रिम,छूट गया
क़ैद
हुआ
फिर
इन्साफ सलाखों में
हाल
गरीबों का, अब देख वतन में
इक
खौफ़ नज़र आयेगा, आखों में।
33
:
नज़्म
हिफाज़त
हवाओं से करनी पड़ेगी
सोच
लेना
चिराग
जलाने
पहले
यहां
दिन
को रात,
बना
डालेंगे
फ़रेबी
लोग
सूरज
बुझा
डालेंगे
खामोशी
से ज़ुल्म,सहते रहे अगर
ये
ज़ुल्म को,रिवायत बना डालेंगे,
तय
करनी ही पड़ेंगी ,दिशाएं तुम्हें
सफ़र
में
क़दम
बढ़ाने
से
पहले।
दुश्मनी
को कैसे भी निभाना यहाँ
पर
दोस्त,सोच
समझ,बनाना
यहाँ
इस
मानव
में अब
मानवता
नहीं
मतलबी
हो गया
है, ज़माना
यहाँ,
किरदार
की ,
कहानी
देख
लेना
रिश्ता
किसी
से,
बनाने
से पहले।
लोग
धर्म
के नाम पर भड़कायेंगे
फिर
आपस मे तुमको लड़वायेंगे
राष्ट्र
की सत्ता का धंधा करने वाले
ये
सियासी,राष्ट्रवाद ,तुम्हें पढ़ायेंगे,
पहचान
सच,झूठ
की करनी पड़ेंगी
मतदान,की मोहर, लगाने से पहले।
34
ढाने
वाला
है दिल
पर कहर
कोई
ख़्वाबों
में
आने लगा है नज़र कोई
वो
तो,लौट
गया,पत्थर
फ़ेक पानी मे
दौड़
रही
इस
दरिया
में लहर कोई
उम्र
गुज़र ना
जाये दर-बदर
फ़िरते
हमको
मन्ज़िल का दे दे,सफ़र कोई
कुछ
और पिला,साकी,प्यास को मेरी
जाम
करता नहीं मुझपर असर कोई,
शेर
यार
को पागल
बना
सकते
हैं
मगर
कितनी
देर
तक
धूप
को
बादल
छुपा
सकते
हैं मगर
कितनी
देर
तक
बेख़बर,
सच
सामने आ ही जायगा, इक दिन,खुद ब खुद
झूठ
से
बातें
बना
सकते
हैं,
मगर
कितनी
देर
तक।
35
वैभव
बेख़बर
अब
चला है, ये कैसा, दस्तूर यहाँ
आदमी
,हो
रहा
है,
मजबूर
यहाँ
अब
सियासत,ग़रीबों पर,ज़ुल्म करे
हो
गया ,है
ज़माना,
भी
क्रूर
यहां
आत्महत्या
करे, रोज़
किसान कोई
भूख
से,
लड़
रहा
है मज़दूर
यहां
लुट
गए,
चाँद
सूरज,सब
जुगनू भी
बिक
रहा अब दुकानों में,नूर यहां
भूल
वादे,गया सब पाकर कुर्सी
अब
सियासी बहुत है मग़रूर यहाँ
हो
रही
शर्मसार
दया,
मानवता
कर
रहे,लोग,शोषण भरपूर यहाँ।
36
वैभव
बेख़बर
बात
नहीं कुछ
उसकी बे-वफ़ाई
की
रोज़
समां,दिल
में,जलती, तन्हाई की
इश्क़
रहा, तड़पाता
उम्रभर
दिल
को
कौन
घड़ी
में
उससे
, आशनाई
की
आशनाई=मुहब्बत
काम
मुसीबत
में
, आया
नहीं
कोई
जाने,किस किस की,
हमने
भलाई की
मर्ज़
से, अच्छा
हमको,मौत आ जाये
इतनी
ज़्यादा
कीमत
है,
दवाई
की
दौर
कहाँ
है ,
अब
ईमानदारी
का
खून
पसीने,
से
किस
ने ,कमाई
की
…
37
काम
बिगड़े
हुये
, जाते
सँवर
वक़्त
रहते
सुधर,
जाते
अगर
अज़नबी
की
तरह
,मिलते
हुए
रोज
नज़दीक
से,
जाते
गुज़र
देख
लेता
,तसल्ली
से
तुम्हें
आप
दो पल, ठहर
जाते
अगर
तन-
बदन में,
समाया
है
वही
दूर
उससे
भला,
जाते
किधर
बेख़बर,जां निकल जाती
मिरी
काश
तुम इस क़दर ,ढाते कहर।
38
दर्द
दिल का यहां मिटाने आ
आ
कभी
तो,शराबखाने आ
ख़्वाब,झूठे बहुत दिखाये थे
ख़्वाब,फिर से वही,दिखाने आ
दिल
बहुत बेकरार है तुम बिन
आज
मिलने,किसी
बहाने आ
मैं
सदा
ही ,तुम्हें
सजाऊंगा
तू
भले
ही
मुझे
मिटाने
आ
है
भरोसा बहुत किया,तुमपर
फिर
से पागल,हमें बनाने आ
39
वज़्न
2 1
2 2 1 2 1 2
वैभव
बेख़बर
दिल
बहुत ,ग़म
ज़दा हुआ
इश्क़
में,
और
क्या,
हुआ
कट
गए ,
पाँव
भीड़
में
तब
कहीं
, रास्ता
हुआ
बा-वफ़ा,
बन
नही
सका
बे-वफ़ा,
बे-वफ़ा
हुआ
शर्म
क्यों,
आदमी
करे
दौर
जब,
बे-हया
हुआ
लब
ज़रा,
हस-हँसा,
लिये
दर्द
फिर,
इक
नया
, हुआ
क्या
बतायें,
सफ़र
तुम्हें
हर
कदम,
इन्तहां
हुआ।
40
वैभव बेख़बर
बेबस
औ,बद-नसीब
हैं
जो
लोग
यहाँ
गरीब हैं
बरसे,
गीली,ज़मीन पर
बादल,कितने,अजीब हैं
गर्दिश,
में
दूर
हो
गये
सब
मतलब के हबीब हैं
हबीब=दोस्त यार
छोड़
चले, साथ
हौसले
जब
मन्ज़िल,के करीब हैं
झूठ
को,सच
अबलिखें,यहाँ
सत्ता
के कुछ अदीब हैं
अदीब=साहित्यकार
रक़ीब
[41
:
नज़्म
लूट
कर इंसानियत,
ना
कोई कमाल
कर
पीड़ा
देख भूख की,ग़रीब का ख़्याल कर
वो
तो
आदमी के भेष में ,है कोई जानवर
जो
आदमी,आदमी
के,काम
न आये अगर
उठाकर
बाइबिल गीता,कुरान फिर देख तू
सिर्फ
दौलत के ख़ातिर, ईमान मत बेच तू
अब
झूठ का विरोध कर,सच्चे सवाल कर
पीड़ा
देख भूख की ,गरीब का ख्याल कर
हर
भृष्ट सियासी
को,
सत्ता
से उतार
दो
संविधान
न
माने, उसे
मुल्क़ से निकार दो
तभी
डिजिटल इंडिया की शुरुआत होगी
जब
मज़दूर,और किसानों की
बात
होगी
अब
धर्म, जातिवाद
पर न कोई बवाल कर
पीड़ा
देख,भूख
की, ग़रीब
का ख्याल
कर।
42
ज़माने में जहां देखो बिका ईमान लगता है
जिसे तुम आदमी कहते ,मुझे सामान लगता है
हुनर
का खेल है, सब कुछ धरा के इस समन्दर में
मुझे पतवार लगती जो उसे तूफान लगता है
मुहब्बत हो गयी जबसे, क़दम थकते नहीं मेरे
यहाँ
मुश्किल सफ़र भी आजकल आसान लगता है
नज़र
से देखकर तुमको, नज़र जब आईना देखे
मेरा
चेहरा मुझी को फिर बहुत अनजान लगता है
भटकता उम्रभर अक्सर ,बनाने में ,मिटाने में
यहाँ
हर आदमी मुझको ,
बहुत नादान लगता है
43
रेत का ,हैं समन्दर ख़गाले हुए
इसलिए पांव में , सुर्ख़ छाले हुए
इस
तरह के,दीये तेज़ किस काम के
लुट
गया,जब शहर, तब उजाले हुए
हर
ख़ुशी नें बहुत
बस
गिराया यहाँ
दर्द ही ,अब मुझे हैं सँभाले हुए
रोज़ करते रहे, पर सुने ना गये
इश्क़ के बे-असर पाक नाले हुए
नाले=आह
,फ़रियाद
दिन, सरेआम लुटते रहे बेख़बर
ज़ुर्म
,क्यों रात के सब हवाले हुए।
44
मन्ज़िलों
का सफ़र पास आने लगा
पांव जब राह में, मैं बढ़ाने। लगा
तीरगी फ़िर उसे रोक सकती नहीं
प्रीत
का जो दिया, दिल जलाने लगा
यूँ नहीं आ गया दौर ये झूठ का
आदमी अब यहाँ सच ,छिपाने लगा
हो
रही किस कदर अब सियासत यहाँ
मुल्क़
क्यों मज़हबी गुल खिलाने लगा
हक
तो हक,हाँथ से रोटियां छीन लीं
तब यहाँ, पेट खंज़र, चलाने लगा
आ
गए जब परिन्दों के पर बेख़बर
छोड़कर घोसला दूर जाने लगा
45
वक़्त
के हाँथ उलझी पड़ी है बहुत
ज़िन्दगी इक मुसीबत बड़ी है बहुत
उस
सफ़र को,ज़रा देख सुन कर चलो
जिस डगर में यहां रौशनी है बहुत
दिल जिसे रूह में , हैं बसाये हुये
आँख अक़्सर उसे ढूँढती है बहुत
याद करती उन्हें, पल गुज़र जो गये
बे-वज़ह हर घड़ी सोंचती है बहुत
दौर दौलत का जबसे चला बेख़बर
इश्क़
की, हर किसी में ,कमी है बहुत।
46
जंग होती रही, धर्म की ज़ाति की
आदमीयत यहां रोज मरती रही
वाद का भाव मन को पढ़ाया गया
झूठ को इस कदर सच बनाया गया
नीव
, तोड़ी गयी, पीर ज़ज़्बात की
रूह की बेबसी ,बस तड़पती रही
बुद्धिजीवी नये , ढोंग गढ़ते रहे
रीति के नाम पर, लोग चलते रहे
पीर बढ़ती रही , भूख की प्यास की
प्राण की वेदना, आह भरती रही
मतलबी कुछ फ़रेबी हुआ आदमी
पाशविकता लिए फिर रहा आदमी
ईंट धसती रही , रोज बुनियाद की
सभ्यता मौन साधे, सिसकती रही।
47
रूह तक दर्द का आशियाना हुआ
ज़ख़्म
दिल का ज़ियादा पुराना हुआ
याद आये नहीं वो अकेले कभी
अश्क़
का भी निग़ाहों में आना हुआ
दर्द मालुम हुआ ,चोट आयी समझ
तीर खुद, तीर का ,जब निशाना हुआ
शान मेहनत से अपनी दिखाते यहाँ
बेचकर के,नियत, क्या कमाना हुआ
रूप
का, नक़्श हर आज भी याद है
उसको देखे हुए इक ज़माना हुआ।
48
साँझ ज़र्ज़र मुसलसल सहर हो गयी
जैसे-
तैसे
हमारी बसर हो गयी,
इश्क़
मालुम हुआ ,ना उन्हें आज तक
हर किसी को, हमारी ख़बर हो गयी,
मयकदों नें दिया, फिर सहारा मुझे
प्यास
की हर नदी, जब ज़हर हो गयी,
बे-वफ़ा
, जानकर भी निभाते रहे
क्यों मुहब्बत हमें ,इस कदर हो गयी,
जब सफ़र में नहीं, साथ तुम आ सके
याद फ़िर आपकी हमसफ़र हो गयी,
बे-हुनर, थे किसी रोज, घर से चले
राह में , ज़िन्दगी बा-हुनर हो गयी।
49
ज़ख्म रिसते हुये सूख जाते यहां
लोग
मरहम कहाँ अब लगाते
यहां
रास्ते जो बदलते रहे दिन ब दिन
मंज़िलों से वही, छूट जाते यहां
हो
गयी ,है सियासत,घिनौनी बहुत
धर्म
के नाम पर, हैं लड़ाते यहां
है
ज़मीं आपकी, आसमाँ आपका
कुछ
हुनर से नया कर दिखाते यहां
इसलिये उठ रहीं नफ़रतें बेख़बर
इश्क़
में ,दिल बहुत,तोड़े जाते यहां।
50
तअल्लुक़
दिन-ब-दिन बिगड़ते
रहेंगे
अग़र आपस में लोग लड़ते रहेंगे,
मुसीबत देख ,डगमगाना नहीं तुम
ख़ुशी, दर्द , मिलते बिछड़ते रहेंगे,
नहीं
, है आसमाँ, हुक़ूमत किसी की
हुनर
वाले ,फ़ज़ा में उड़ते रहेंगे,
हवायें , नफ़रती उठाते रहे तो
वफाओं के, नगर , उजड़ते रहेंगे
अग़र, सच सामने ,नहीं ला सके तुम
बहुत झूठे नक़ाब गढ़ते रहेंगे।
51
पाँव में , उम्रभर सुर्ख़ छाले रहे
टूटकर हम, ख़ुदी को सँभाले रहे
हार कर, भी कभी, हार मानी नहीं
ख़्वाब
कुछ इस कदर रोज़ पाले रहे
लिख
लिया फिर उन्हींने मुक़द्दर यहां
लोग जितने हुनर के ,हवाले रहे
आदमी को बनाता, मिटाता रहा
वक़्त
के, खेल अक्सर निराले रहे
फ़िर अँधेरे सताते रहे बेख़बर
चार दिन, ज़िन्दगी में उजाले रहे।
52
कि
चारों तरफ़ बेबसी आ गयी
ये
किस मोड़ पर ज़िन्दगी आ गयी
दिये उम्रभर जो बुझाते रहे
उन्ही के लिए रौशनी आ गयी
तअल्लुक़ वही, टूट जाते यहाँ
वफ़ा
में ,जहाँ कुछ कमी आ गयी
कड़ी
धूप थी, फिर अचानक यहाँ
कहाँ
से हवा में, नमी आ गयी
53
नयन सेज पर तुम बिछाते चलो
नये
ख़्वाब खुद में सजाते चलो
ये
सूरज, सुबह तक उगेगा नहीं
अँधेरे , दिये से भगाते चलो
अग़र
बन ,सको तो,बनो सेतु सा
नदी
के, किनारे मिलाते चलो
ज़रा बाजुओं में ,हुनर है अग़र
सफ़ीना भँवर से, लड़ाते चलो
सबक सीख लो,मग़र छोड़ दो
गुज़र
जो, गया है , भुलाते चलो।
54
:
आदमी इस क़दर रोज गिरता कहीं
आग लगती, धुआँ दूर उठता कहीं
मतलबी हो गया है ज़माना बहुत
दाम देता कहीं, काम लेता कहीं
जंग कैसे लड़ूँ , ज़िन्दगी से यहां
तीर लगता कहीं, दर्द उठता कहीं
है निहत्थे खड़ी, भूख बाज़ार में
इश्क़
लुटता कहीं, ज़िस्म बिकता कहीं
रोज कुदरत यही खेल करती यहां
साँझ ढलती कहीं,दिन निकलता कहीं।
55
बोझ
भी ज़िन्दगी का उठाया बहुत
हर घड़ी बेबसी ने सताया बहुत
बे-वज़ह ही यहाँ आग बदनाम है
नफ़रतों ने शहर ये जलाया बहुत
मन्ज़िले
ना मिलीं,कुछ नहीं है गिला
रास्तों ने, हुनर तो, सिखाया बहुत
मौत के सामने ,आ गयी फिर दुआ
हादसों
ने हमें आजमाया बहुत
देखकर दर्द दिल, धूप नम हो गयी
चाँदनी ने हमें क्यों जलाया बहुत
भूलकर
भी हमें,,वो भुला ना सका
इश्क़
उसका हमें, याद आया बहुत।
56
तोड़कर क्यों मिटाया आपने
फूल दिल मे खिलाया आपने
भूल जाना कहाँ आसान था
याद फिर क्यों दिलाया आपने
ज़िन्दगी को दिखाकर ख़्वाब में
मुझको
पागल बनाया आपने
दूर तक हो गया, वीरान सब
दिल जलाकर बुझाया आपने
है असर इश्क़ का क्यों आज़तक
कैसा
जादू
चलाया आपने
शेर लिखने लगी अपनी क़लम
दर्द
क़ाबिल बनाया आपने।
57
छीनकर हाँथ से हर ख़ुशी ले गयी
दर-बदर
, उम्रभर बे बसी ले गयी
ढूँढतें हम रहे, हर गली , हर शहर
दूर शायद तुम्हें ज़िन्दगी ले गयी
यार की, चाह में, दिल भटकता रहा
क्या बताऊँ कहाँ, बन्दगी ले गयी
इससे अच्छा, अँधेरों में, होती बसर
आँख ही, छीनकर, रौशनी ले गयी
याद आने लगे, इस कदर आप क्यों
मयक़दे फ़िर हमें , बेख़ुदी ले गयी
ज़िस्म
से जब परे, इश्क़ अपना हुआ
रूह तक, तब हमें , शायरी ले गयी
58
धार मझधार में दम लगाते रहो
नाव अपनी सदा तुम बढ़ाते रहो
कब तलक वक़्त दुश्वार होगा यहाँ
बस
हुनर, दाँव पर, तुम लगाते रहो
कुछ ज़रूरी नहीं यार सूरज बनो
जुगनुओं की तरह जगमगाते रहो
ख़ुद
ब ख़ुद, झूठ का दुर्ग ठह जाएगा
राह सच पर, कदम तुम बढ़ाते रहो
आग
भी कुछ लगाने, लगे हैं यहाँ
तुम चिराग़ों को ऐसे, बुझाते रहो।
59
:
शेर लिखना बहुत ही सरल हो गया
इश्क़ जबसे हमारी ग़ज़ल हो गया
प्यार
से, यार जब ,प्यार तुमने किया
ज़िन्दगी का हसीं याद पल हो गया
कर
दिया इस कदर गर्द माहौल यहां
साँस
लेना कठिन
आजकल
हो गया
इम्तिहां में नहीं,पास सच हो सका
झूठ
वाला मग़र क्यों
सफ़ल
हो गया
कल
कैसे तुम सियासत करोगे यहाँ
हर मसौदा अग़र आज हल हो गया
हम नहीं शौक़ से , हो शराबी गये
इश्क़
में ,इस क़दर यार छल हो गया।
60
मन्ज़िलों
का सफ़र पास आने लगा
पांव जब राह में, मैं बढ़ाने। लगा
तीरगी फ़िर उसे रोक सकती नहीं
प्रीत
का जो दिया, दिल जलाने लगा
यूँ नहीं आ गया दौर ये झूठ का
आदमी अब यहाँ सच ,छिपाने लगा
हो
रही किस कदर अब सियासत यहाँ
मुल्क़
क्यों मज़हबी गुल खिलाने लगा
हक
तो हक,हाँथ से रोटियां छीन लीं
तब यहाँ, पेट खंज़र, चलाने लगा
आ
गए जब परिन्दों के पर बेख़बर
छोड़कर घोसला दूर जाने लगा
61
हम ऐसा क्या गुनाह कर गए
ज़िन्दगी तुम तबाह कर गए,
नाम बदनाम ,इश्क का , न हो
इसलिए हम निबाह कर गए,
क्यों अँधेरा क़सूर वार था
दिन उजाले सियाह कर गए,
सियाह=काला
बेवफ़ा इसलिए सनम हुए
इश्क़ हम बे-पनाह कर गए,
62
यह
ज़मीं है कहाँ आसमाँ हमारा
दर
बदर फिर रहा कारवाँ हमारा,
ज़िन्दगी
को मिला ये सबब वफ़ा का
लुट
गया इश्क़ में आशियाँ हमारा,
दुश्मनों
से कोई क्या गिला करे हम
लूट
जब ख़ुद रहा पासबाँ हमारा,
पासबाँ
= रक्षक
फिर सताता रहा , उम्रभर अँधेरा
चार
दिन ही रहा, वो समाँ हमारा,
शेर, मेरे अमर हो गए इस जहाँ में
तुम मिटा ना सकोगे, निशाँ हमारा,
63
नींद
आंखों से कहाँ जाने लगी
याद
उनकी आज फिर आने लगी
काम भी बेकार लगता था कभी
गलतियाँ उसकी हमें भाने लगीं
साथ मेरे आप जबसे आए हैं
ज़िन्दगी
कुछ रास ,फिर आने लगी
सब
अदाएं ,कोयलों की तोड़ दीं
तितलियाँ
जब गीत वो
गाने लगीं
दुश्मनों को,मत कोई इल्ज़ाम दे
ज़िन्दगी, ही ज़ुल्म अब ढाने लगी,
64
याद
आने
लगी रात फिर आपकी
हम
भुला ना सके बात फिर आपकी,
राह में तीरगी , जब सताने लगी
आ गयी रौशनी , रात फिर आपकी,
आज तस्वीर तेरी जला दी मग़र
आइने कह उठे, बात फिर आपकी,
दूरियाँ
बढ़ गयीं, किस तरह सोचकर
याद आयी मुलाक़ात ,फिर आपकी,
ख़ूब सच्चा लगे , झूठ भी प्यार में
दिल
मेरा खा गया, मात फिर आपकी,
65
इश्क़
का दिल मेरा निशां लेकर
दर
बदर फिर रहा गुमां लेकर
रास आता नहीं हवाओं को
रात कैसे चलूँ समां लेकर
बादलों की हमें तमन्ना थी
आ
गए आप। फिर धुँआ लेकर
मौन थी , बेबसी मुक़द्दर से
आपने क्या किया,ज़ुबां लेकर
मुश्किलें हर तरफ़ नज़र। आएं
आ गयी ज़िन्दगी,कहाँ लेकर
आप।
ही चल। पड़े अकेले तो
फ़िर
चले। कौन, कारवाँ लेकर
66
पहले ज़रा सीखिये एतबार करना
गर
चाहते हो किसी से प्यार करना
बिगड़ा,सुधर जाएगा किस्सा तुम्हारा
बस पाक ईमान से किरदार करना
दुशवार
होगा सफ़र यह ज़िन्दगी का
कुछ
हुनर बाज़ुओं में तैयार करना
उसकी
ख़ुशी के लिए,हाँ कर दिया था
क्या हम नहीं जानते इनकार करना।
67
फ़िर
हक़ीक़त छुपा ली जाएगी
कब
तलक बात टाली जाएगी
तब
कहीं अब्र पानी लाएगें
आग
जब फिर लगा ली जाएगी
प्यार
का मौसम है,तो प्यार कर
दुश्मनी
फिर निभा ली जाएगी
रात
दिन रब से मांगा है उन्हें
कब
तलक आह खाली जाएगी
निकलेगा
इश्क़ अब सैलाब बन
पीर ना और पाली जाएगी,
68
कितनी
चाहत, कितना चाहा आपको
छिप
छिप अक्सर हमने
देखा
आपको
चाहत हमसे करते थे कुछ और भी
हमने जीवन ,सौंप दिया था आपको
चाँद से, बातें करता रहता इसलिए
चाँद में, अक्सर हमने देखा आपको
हम
भूल गए मन्ज़िल अपनी प्यार में
राह दिखाई, फिर पहुँचाया आपको
हर रस्ते से हमने तो आवाज़ दी
तन्हा तनहा सिर्फ़ बुलाया आपको,
69
पांव जाने किस डगर जान लगे
ख़्वाब
में तुम फ़िर,नज़र आने लगे,
हम उन्हीं के वास्ते जीते रहे
वो हमीं पर क्यों कहर ढाने लगे,
कर्ज़
ने बेहाल कर दी ज़िन्दगी
अन्यदाता ही ज़हर खाने लगे,
हम ज़माने से अभी हैं बेख़बर
आप
तो हद से गुज़र जाने लगे,
बाप दादा की जमीनें छोड़कर
लोग जाने क्यों शहर जाने लगे,
हम
अब भी वहीं
खड़े
हैं बेख़बर
लोग देखो चाँद पर जाने लगे,
70
रौशनी रात की चाँदनी है और क्या
है
सफ़र मौत का ज़िन्दगी है और क्या,
भूल
कुछ
है
गुमां
काश्तकार बना फिरे
ज़िस्म
का पथिक है आदमी है और क्या,
अश्क़ हैं दर्द है बे-वजह बेचैन हैं
रोग है इश्क़ का, बेखुदी है और क्या,
डूब
कर
तैरना
धार में मझधार में
आग
की
है
नदी
आशिकी है और क्या,
प्यार
क्या
यार
क्या,
हो गए बेकार सब
मतलबी
मेल है दोस्ती है और क्या,
वैभव
बेख़बर
71
आ जायेगा आराम मुझे
बस पीने दे, इक जाम मुझे
मैंने तो फ़ूल खिलाये थे
ख़ार
का, मत दो इल्ज़ाम मुझे
मेहनत
करना अच्छा लगता
मिल
जाते,कुछ ग़र दाम मुझे
प्यार
था ,झूठा नाटक उसका
बस करना था बदनाम मुझे
सूरत अपनी भूल गया हूँ
पर याद है उसका नाम मुझे
मीठी मीठी बातें कर के
कर सकता है नाक़ाम मुझे।
72
जुगनुओं की तरह जगमगाते रहो
दीप
, तुम आँधियों में जलाते रहो
एक उम्दा कहानी बनेगी यहाँ
पाक क़िरदार बस तुम निभाते रहो
दूर हैं मन्ज़िले , रास्ते हैं कठिन
मुश्किलों में क़दम, तुम बढ़ाते रहो
ख़ुद-ब-ख़ुद
बोझ सबका उतर जायगा
काम इक दूसरे का बटाते रहो
दर्द का भाव महसूस करते हुए
प्रेम के गीत सबको सुनाते रहो
पत्थरों की तरह बन खुदा जाओगे
ख़ुद हुनर पर हथौड़ी चलाते रहो
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